मुख्यपृष्ठस्तंभलोक विमर्श : विश्व धरोहर दिवस...धरोहरों पर बमों की बारिश...

लोक विमर्श : विश्व धरोहर दिवस…धरोहरों पर बमों की बारिश…

लोकमित्र गौतम

मानव सभ्यता का इतिहास केवल किताबों में ही नहीं लिखा जाता, यह कई और तरीकों से भी दर्ज होता है। कलाकृतियों से, साहित्य से, महान फिल्मों से, दुनिया को बदल देनेवाले आविष्कारों से और ऐतिहासिक स्थापत्यों से भी यानी वो महान इमारतें जो अपने आप में किसी युग की सभ्यता और संस्कृति का पर्याय बन जाएं। १८ अप्रैल विश्व धरोहर दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि दीवारों, खंडहरों और पत्थरों में सांस लेते इतिहास से इंसान मानव सभ्यता के अतीत की पदचाप सुन सके।
प्रासंगिकता?
लेकिन जब विश्व धरोहरों पर युद्ध के दौरान दुश्मन सारे नियम-कायदों को भूलकर उन पर बम बरसाएं, उन्हें चकनाचूर करने का एक भी मौका न गंवाएं तो फिर ऐसे विश्व धरोहर दिवस (१८ अप्रैल) की क्या प्रासंगिकता बचती है? यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर की जा रही आलोचना नहीं है। मौजूदा समय में ईरान, उसके पहले इराक, सीरिया, जॉर्डेन, लेबनान और गाजापट्टी पर कई ऐतिहासिक इमारतों को, जो विश्व धरोहरों के रूप में चिह्नित की गई थीं, गोला-बारूद से नेस्तनाबूद की गई हैं। ये अब महज ढांचे या खंडहर के रूप में ही बची हैं।
जबकि यूनेस्को जिन मानव निर्माण या अतीत की धरोहरों को विश्व धरोहर की मान्यता देता है, उनकी सुरक्षा और संरक्षा का दायित्व पूरी दुनिया का होता है, क्योंकि भले उन पर ऐतिहासिक या भौगोलिक रूप से स्वामित्व किसी देश विशेष का होता हो, लेकिन यूनेस्को के चार्टर के मुताबिक वो समूची मानवता की प्रेरणा स्रोत होती हैं। समूची मानवता उनसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से गौरवान्वित होती है। ईरान की प्राचीन नगरी पर्सेपोलिस, भारत का ताजमहल, कंबोडिया का अंकोरवाट का मंदिर और मिस्र के पिरामिड भले सीमित अर्थों में उन देशों के मालिकाने में आते हों, जहां यह भौगोलिक रूप से स्थित हैं। लेकिन ये किसी देश के बजाय समूची दुनिया और समूची मानव सभ्यता की धरोहर हैं इसलिए युद्ध के दौरान भी इन्हें नुकसान न पहुंचे, इसकी युद्धरत पक्षों से उम्मीद की जाती है, लेकिन ये उम्मीदें कभी पूरी नहीं होतीं। इस समय पिछले लगभग दो महीनों से ईरान में अमेरिका और इजरायल द्वारा जो बमबारी हुई है, उससे तेहरान की कई ऐसी इमारतें, कई ऐसे मकबरे ध्वस्त हो गए हैं, जो वैश्विक सभ्यता और संस्कृति की धरोहर थे।
लेकिन यह कोई पहला ऐसा मौका नहीं है। साल २००१ में अफगानिस्तान में तालिबान लड़ाकों ने बामियान बुद्ध की मूर्तियों को डायनामाइट लगाकर उड़ा दिया था। इससे बुद्ध युग की सबसे संवेदनशील धरोहर मटियामेट हो गई। इराक युद्ध में मेसोपोटामिया के धरोहर के रूप में खड़े महलों को न केवल ध्वस्त कर दिया गया था बल्कि यहां के कई संग्रहालयों में मौजूद मेसोपोटामिया सभ्यता के सैकड़ों अवशेषों को दुश्मन देश और उसके सैनिकों ने लूट लिया था। इसके पहले सीरिया में पालमायरा का विध्वंस भी दुनिया देख चुकी है।
इन सब अतीत की गलतियों से इंसान ने कतई कोई सबक नहीं लिया। इसलिए हाल में ईरान की कई धरोहरों को वैसे ध्वस्त किया गया है, जैसे पहले होता रहा है।
दुनिया की धरोहर
इस सबको देखकर एहसास होता है कि आखिर विश्व धरोहर दिवस की जरूरत ही क्या रह जाती है? आखिर इसका क्या अर्थ बचता है? अगर हम ये मानते हैं कि महान वैश्विक धरोहरें, हमारे अतीत का गौरव हैं, हमारी सामूहिक मानव स्मृति हैं तो फिर हम इनके अस्तित्व को इस तरह नष्ट क्यों करते हैं? विश्व धरोहर का मतलब ही है यह पूरी दुनिया की धरोहर है। जब किसी इमारत, किसी भौगोलिक क्षेत्र की विशेष खूबियों को या महान निर्माण स्थलों, पूजा घरों और सांस्कृतिक गतिविधियों को वैश्विक धरोहर मान लिया जाता है तो फिर उसे अगली पीढ़ियों तक के लिए बचाकर रखने की जिम्मेदारी उस देश की नहीं होनी चाहिए, संयोग से जहां यह स्थित है, बल्कि इसकी जिम्मेदारी पूरी दुनिया पर होनी चाहिए, तभी विश्व धरोहर जैसे किसी तमगे का कोई अर्थ होगा।
आज ईरान तहस-नहस हो रहा है। कल को वो देश भी हो सकते हैं, जो आज कर रहे हैं। इस सिलसिले का अंत तब तक नहीं होगा, जब तक सुरक्षा सिर्फ ताकत से संभव होगी। इसलिए या तो वैश्विक धरोहरों को लेकर सख्त कानून बने और इस पर सख्ती से अमल हो, बिना इस बात की छूट देते हुए कि युद्ध के दौरान सब कुछ जायज होता है वर्ना विश्व धरोहरों का कोई अर्थ नहीं रह जाता। जब लोगों पर पागलपन सवार होता है तो सब बड़ी-बड़ी बातें भूल जाते हैं। अगर इस पारंपरिक तरीके से धरोहरों के बचने को लेकर हमेशा आशंका हो तो फिर इनके संरक्षण के नए-नए तरीके अपनाए जाने चाहिए। जैसे डिजिटल आर्काइविंग, थ्रीडी स्वैâनिंग आदि वर्ना जो रवैया इन दिनों या पिछले कुछ दशकों में देखने को मिला है, उससे तो लगता है ये अच्छे से विचार सिर्फ शांतिकाल के मनोराग होते हैं। जब कठिन समय होता है, तब उनके बारे में कोई नहीं कुछ सोचता, क्योंकि अगर युद्धों के दौरान धरोहरों की सुरक्षा संभव न हो तो फिर फायदा क्या है?
संवेदनशीलता
भले हम आज कुछ भी कहें आखिरकार बामियान के बुद्ध नष्ट हो गए न? करते रहिए आलोचना देते रहिए, चेतावनियां, मगर फर्क क्या पड़ता है? भारत में ४० से अधिक विश्व धरोहर स्थल हैं, इसलिए हमें अपनी धरोहरों के प्रति बेहद संवेदनशील होना चाहिए। विश्व धरोहरों को बहुत कमाई का साधन बनाने से भी परहेज करना चाहिए। जिस तरह से ताजमहल, अजंता एलोरा की गुफाएं और हम्फी के मंदिर कॉम्प्लेक्स में दिनों-दिन पर्यटकों का हुजूम उमड़ता है, उससे भी इनको नुकसान होता है। विश्व धरोहरों को अगर सचमुच सदियों-सदियों तक बचाकर रखना है तो उनकी सुरक्षा को लेकर हमें बेहद संवेदनशील होना पड़ेगा। सिर्फ जंग से ही उन्हें बचाने की जरूरत नहीं है बल्कि पर्यटकों के उमड़ रहे उपभोक्तावादी प्यार से भी उन्हें बचाने की जरूरत है। क्योंकि अगर किसी जगह पर उसे देखने के लिए ही हर दिन हजारों की तादाद में लोग जाएं तो ऐसी जगहों को कई तरह के दबाव झेलने पड़ते हैं। इसलिए इन सबसे से भी धरोहरों को बचाने की जरूरत होती है। अगर हम वैश्विक धरोहरों को लेकर, वैश्विक स्तर की संवेदनशीलता नहीं दिखाते तो फिर ऐसे दिन का कोई अर्थ नहीं है।
विश्व धरोहर दिवस
कुछ तथ्य, कई चुनौतियां
– विश्व धरोहर दिवस हर साल १८ अप्रैल को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत १९८२ में इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मैन्यूमेंट्स एंड साइट्स द्वारा प्रस्तावित की गई और १९८३ में इसे यूनेस्को द्वारा मान्यता मिली।
– साल २०२५ में पूरी दुनिया में १,१०० से अधिक प्रसिद्ध इमारतों, प्राकृतिक स्थलों और महान सांस्कृतिक गतिविधियों को वैश्विक धरोहर का दर्जा हासिल था।
– भारत में ४० से ज्यादा विश्व धरोहरों हैं, जिनमें ताजमहल, कुतुबमीनार, अजंता-एलोरा की गुफाएं, कुंभ जैसा धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन तथा दुर्गा पूजा जैसे अनुष्ठानिक समारोह शामिल हैं।
– विश्व धरोहरों को जिन मानवीय गतिविधियों से सबसे ज्यादा खतरा है, उसमें युद्ध और आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, अतिक्रमण और शहरीकरण तथा पर्यटन आदि का दबाव शामिल है।
– विश्व धरोहरों पर जिस तरह के खतरे मंडरा रहे हैं, उन्हें देखते हुए इनके संरक्षण के कुछ आधुनिक तौर-तरीके भी सुझाए जा रहे हैं। जैसे इनकी थ्रीडी स्वैâनिंग यानी डिजिटल संरक्षण, सख्त अंतर्राष्ट्रीय कानून और लगातार शिक्षा और जागरूकता के जरिए चलाए जाने वाले अभियान। इन सबके जरिए ही विश्व धरोहरों की सुरक्षा संभव है।

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