मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत :  बोया गया बीज, जिसकी छाया आज भी है

रुख-ए-सियासत :  बोया गया बीज, जिसकी छाया आज भी है

तौसीफ कुरैशी

भारतीय राजनीति की स्मृति बड़ी अजीब चीज है। वह अक्सर उन लोगों को जल्दी भूल जाती है, जिन्होंने चुपचाप व्यवस्था की जड़ों में बदलाव किए। राजीव गांधी उन्हीं में से एक हैं। आज जब महिला सशक्तिकरण की बातें बड़े मंचों से होती हैं तो यह याद करना जरूरी है कि इसकी असली शुरुआत कहां से हुई थी।
राजीव गांधी ने सत्ता के शिखर से नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद से बदलाव की कोशिश की। पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का विचार उस समय सिर्फ एक राजनीतिक पैâसला नहीं था, बल्कि सामाजिक क्रांति का बीज था। यह उस भारत की कल्पना थी, जहां निर्णय लेने की मेज पर महिलाएं सिर्फ दर्शक नहीं, भागीदार हों। १९८९ का वह दौर याद कीजिए, जब लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद राज्यसभा में रास्ता आसान नहीं था। विपक्ष, खासकर भारतीय जनता पार्टी, इस पहल के साथ नहीं खड़ा हुआ। परिणाम यह हुआ कि वह प्रयास अधूरा रह गया। लेकिन विचार मरते नहीं, वे इंतजार करते हैं सही समय का। वह समय आया १९९३ में, जब पी. वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने उसी सोच को फिर उठाया और संवैधानिक संशोधनों के जरिए उसे जमीन पर उतारा। पंचायतों और शहरी निकायों में महिलाओं को आरक्षण मिला। यह सिर्फ कानून नहीं था, यह भारत के सामाजिक ढांचे में एक शांत क्रांति थी। आज देश में लाखों निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं गांव की चौपाल से लेकर नगर पालिका परिषद व नगर निगमों तक। इनमें से कई ने पहली बार घर की चौखट लांघकर सार्वजनिक जीवन में कदम रखा। यह वही बीज है, जो राजीव गांधी ने बोया था और जो अब एक घने वृक्ष की तरह पैâल चुका है। खानदानी और नस्ली व्यक्ति के द्वारा किए गए काम मील का पत्थर साबित होते हैं ऐसे ही राजीव गांधी के कामों को सिर्फ एक सूची की तरह नहीं देखा जा सकता। कंप्यूटर क्रांति की शुरुआत हो या नवोदय विद्यालयों के जरिए ग्रामीण भारत के बच्चों को नई दुनिया से जोड़ना हर पहल में एक दूरदृष्टि थी। वे जानते थे कि भारत को २१वीं सदी में ले जाना है तो उसे भीतर से मजबूत करना होगा। आज जब महिला आरक्षण की नई बहसें चल रही हैं, तब यह सवाल भी उठता है कि क्या हम अपने इतिहास के उन अध्यायों को याद रख पा रहे हैं, जिन्होंने यह रास्ता बनाया। कांग्रेस के लिए भी यह आत्ममंथन का विषय है कि क्या वह अपने ही किए कामों को उतनी दृढ़ता से जनता के सामने रख पा रही है। राजनीति में स्मृति का क्षरण खतरनाक होता है। क्योंकि जब हम भूलते हैं तो हम सिर्फ अतीत नहीं खोते, भविष्य की दिशा भी धुंधली कर देते हैं।
सत्यमेव जयते

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