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नियमों की उड़ीं धज्जियां… लाल परी में रिटायरमेंट के बाद ‘आर्थिक शोषण’!

-ग्रेच्युटी रोकी, ब्याज में हुआ खेल नो-ऑब्जेक्शन, छुट्टी और फाइलों के बहाने करोड़ों का नुकसान

-जांच कमेटी बनाकर वसूली की उठी मांग

सामना संवाददाता / मुंबई

नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुए एसटी महामंडल में रिटायरमेंट के बाद कर्मचारियों के साथ कथित ‘आर्थिक शोषण’ का गंभीर मामला सामने आया है। इसमें ग्रेच्युटी जैसी वैधानिक राशि को जानबूझकर रोका जा रहा है और देरी के नाम पर ब्याज का खेल खेला जा रहा है। नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट, अधिकारियों की छुट्टियां और फाइलों के बहाने बनाकर भुगतान टालने की प्रवृत्ति ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि करोड़ों रुपये का अतिरिक्त बोझ खुद महामंडल पर पड़ रहा है। इस पूरे प्रकरण ने सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं अब जांच कमेटी गठित कर जिम्मेदारों से वसूली की मांग जोर पकड़ने लगी है।
राज्य परिवहन महामंडल में सेवानिवृत्त अधिकारियों और कर्मचारियों को समय पर ग्रेच्युटी का भुगतान न किए जाने के कारण करोड़ों रुपए का ब्याज देना पड़ रहा है। इस पूरे मामले में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग महाराष्ट्र एसटी कर्मचारी कांग्रेस के महासचिव श्रीरंग बरगे ने की है। एसटी महामंडल में कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी ट्रस्ट की व्यवस्था है, जिसके तहत सेवानिवृत्ति के ३० दिनों के भीतर भुगतान किया जाना अनिवार्य है। ग्रेच्युटी की अधिकतम सीमा २० लाख रुपए है। हालांकि, सेवा अवधि के अनुसार राशि कम या अधिक हो सकती है। नियमों के अनुसार, यदि ३० दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया जाता, तो लगभग १० प्रतिशत मासिक दर से ब्याज देना पड़ता है। दरअसल, बिना किसी बहाने के यह राशि संबंधित कर्मचारी के बैंक खाते में ३० दिनों के भीतर जमा की जानी चाहिए। लेकिन बैंक, सहकारी संस्था या अन्य बकाया के कारण ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ समय पर नहीं मिल पाता। इसके चलते कर्मचारी न्यायालय का रुख करते हैं।
कर्मचारियों को कोर्ट जाने की सलाह
एसटी के कुछ विभागों में अधिकारी और कर्मचारी विभिन्न कारणों का हवाला देकर ग्रेच्युटी भुगतान टालते हैं। इसके बाद सेवानिवृत्त कर्मचारियों को न्यायालय या अन्य न्यायिक संस्थाओं में जाने की सलाह दी जाती है, जिससे मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। परिणामस्वरूप संबंधित विभाग को १० प्रतिशत की दर से ब्याज देना पड़ता है। कुछ मामलों में यह भी सामने आया है कि इस ब्याज राशि का हिस्सा संबंधित अधिकारी और वकीलों के बीच बांटा जाता है। अधिकारियों की लापरवाही के कारण पिछले पांच वर्षों में राज्यभर में लगभग दो करोड़ रुपए से अधिक का ब्याज भुगतान किया गया है। इस प्रक्रिया में कई सेवानिवृत्त कर्मचारियों को अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ा है और कुछ मामलों में मिलीभगत के आरोप भी सामने आए हैं।
गठित की जाए समिति
बरगे ने मांग की है कि इस पूरे मामले की जांच के लिए एक समिति गठित की जाए और जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की इसमें भूमिका पाई जाए, उनसे यह राशि उनके वेतन से वसूल की जाए।

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