मनोज श्रीवास्तव / लखनऊ
“ॐ ह्रीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा” इस मंत्र का जप करके जीवन की अनेक ज्ञात-अज्ञात बाधाओं का विनाश करें।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मां बगलामुखी देवी का प्राकट्योत्सव हुआ है। जिसके कारण इस तिथि को बगलामुखी जयंती के रुप में मनाया जाता है। मां बगुलामुखी दस महाविद्याओं में से एक हैं। ग्रंथों मे इनका रंग पीला बताया गया है और इन्हें पीला रंग पसंद है इसलिए इनका एक नाम पितांबरा भी है। माता बगलामुखी की कृपा से शत्रु का नाश होता है और हर तरह की परेशानी दूर होती है।
पीला रंग मां को अति प्रिय
दस महाविद्या में आठवां स्वरूप देवी बंगलामुखी का है। माता बंगलामुखी पीली आभा से युक्त हैं इसलिए इन्हें पीताम्बरा कहा जाता है। बगलामुखी की पूजा में पीले रंग का विशेष महत्व है। इनका प्राकट्य स्थान गुजरात के सौराष्ट्र में माना जाता है। मां बगलामुखी स्तंभन शक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं अर्थात यह अपने भक्तों के भय को दूर करके शत्रुओं और उनकी बुरी शक्तियों का नाश करती हैं। इन्हें पीला रंग अति प्रिय है इसलिए इनके पूजन में पीले रंग की सामग्री का उपयोग सबसे ज्यादा होता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार सतयुग में ब्रह्माण्ड को नष्ट करने वाला तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे समस्त लोकों में हाहाकार मच गया और समस्त लोक के लोग संकट में आ गये। इस संकट की समस्या में भगवान विष्णु चिंतित हो गए। जब भगवान विष्णु को कोई उपाय ना सूझा तो उन्होंने शिवजी को स्मरण किया, तब भगवान शिवजी ने कहा कि यदि कोई इस विनाश को रोक सकता है तो वो शक्ति रूप है। आप उनकी शरण में जाएं। इसके बाद भगवान विष्णु ने कठिन तपस्या करके शक्ति रूपी देवी को प्रसन्न किया, तब माता बगलामुखी देवी ने प्रकट होकर समस्त लोकों को इस संकट से उबारा।
भारत-चीन युद्ध रोकने के लिए हुआ था मां बगलामुखी यज्ञ
1962 में भारत-चीन युद्ध हुआ तब फौजी अधिकारियों एवं तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश की रक्षा के लिए 11 दिन तक मां बगलामुखी का महायज्ञ कराया था। इसके प्रभाव से 11वें दिन अंतिम आहुति के साथ ही चीन ने अपनी सेनाएं वापस बुला ली थीं। ये यज्ञ मध्यप्रदेश के दतिया में बगलामुखी शक्ति पीठ में हुआ था। वो यज्ञशाला आज भी मौजूद है। पितांबरा पीठ में इस घटना का उल्लेख है। इसके अलावा जब-जब देश पर विपत्ति आती है, तब-तब गोपनीय रूप से मां बगलामुखी की साधना व यज्ञ किया जाता है।
24 अप्रैल 2026 दिन शुक्रवार (वैशाख शुक्ल अष्टमी) को मां बगलामुखी की जयंती मनाई जा रही है। दस महाविद्याओं में से आठवीं माता बगलामुखी को पीला रंग, हल्दी और पीली सरसों अत्यंत प्रिय हैं। इस दिन शत्रु नाश, मुकदमों में जीत और वाक सिद्धि के लिए पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं, जिसे बगलामुखी सिद्धपीठ पर मुख्य रूप से मनाया जाता है।
बगलामुखी जयंती 2026 महत्वपूर्ण तिथियां और समय:
तिथि: 24 अप्रैल 2026 (शुक्रवार)
अष्टमी तिथि प्रारंभ: 23 अप्रैल 2026, रात 08:49 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त: 24 अप्रैल 2026, शाम 07:21 बजे
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:19 से 05:03 तक
पूजा विधि और महत्व:
पूजा विधि: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि के बाद पीले वस्त्र धारण करें। माता की प्रतिमा को पीले कपड़े पर स्थापित करें और हल्दी, पीले फूल, पीली सरसों व बेसन के लड्डू अर्पित करें।
मंत्र: “ॐ ह्रीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा” मंत्र का जाप करें।
महत्व: यह दिन नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने, कानूनी मामलों में सफलता, और जीवन में स्थिरता व आत्मबल बढ़ाने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
व्रत के दिन निराहार रहना चाहिए। रात्रि में फलाहार कर सकते हैं। अगले दिन पूजा करने के बाद ही भोजन करें।
विशेष उपाय:
मां बगलामुखी को हल्दी की गांठ या पीली सरसों अर्पित करने से शत्रु बाधा दूर होती है।
केसरिया हलवा या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।
