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संपादकीय : नरक क्या है?.. यही!

राष्ट्रपति ट्रंप ने कभी न कहा हो ऐसा ज्वलंत सत्य बयां किया और जिक्र किया है कि भारत में वैâसी अफरातफरी मची है। ट्रंप कह रहे हैं कि भारत में नरक जैसी स्थिति बन गई है, वह सच ही है। प्रधानमंत्री मोदी सहित पूरा मंत्रिमंडल वर्तमान में पश्चिम बंगाल जीतने के अभियान पर है। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल को नरक बना दिया है और ‘४ मई के बाद पश्चिम बंगाल को स्वर्ग बनाएंगे’ ऐसी घोषणाएं प्रधानमंत्री कर रहे हैं। प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार के लिए जिस राज्य में जाते हैं, वहां वे यही भाषा इस्तेमाल करते हैं। सिर्फ राज्य और नेता का नाम बदलते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल को स्वर्ग बनाने के लिए मोदी ने देश को नरक बना दिया है। ताजा उदाहरण महाराष्ट्र का ही लें। मराठवाड़ा विभाग में पिछले तीन महीनों में सवा दो सौ किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने की बात सामने आई है। सिर्फ मार्च महीने में ही आत्महत्या की ९५ घटनाएं हुर्इं। यानी हर दिन औसतन चार से पांच किसान आत्महत्या कर रहे हैं। देश में मोदी और महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की पूरी राजनीतिक व्यवस्था की विफलता की यह करुण कहानी है। फिर इस कहानी में आक्रोश के लिए कोई स्थान नहीं है। इसलिए लोगों के पास मूक-बधिर होने और जीने की इच्छा को दबा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। महाराष्ट्र की ‘प्रगति’ का यह चित्र विदारक है। राज्य में बड़े-बड़े उद्योग आ रहे हैं और लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा, ऐसा मुख्यमंत्री फडणवीस ने चार दिन पहले घोषित किया इसलिए कौन-सा चित्र सच माना जाए? यह एक सवाल ही है। वर्ष २०२५ के दौरान मराठवाड़ा में १,१५० किसानों ने आत्महत्या की। यदि यह सरकार द्वारा दर्ज किया गया आंकड़ा है, तो जो किसान
मानसिक आघात से
मरे, जिन्होंने हताश अवस्था में प्राण त्याग दिए, उनकी संख्या इस सरकारी संख्या में जोड़ दी जाए तो कहना पड़ेगा कि मराठवाड़ा श्मशान ही बन गया है। २०२१ से २०२५ की अवधि में कुल ५,०७५ किसान आत्महत्याएं हुर्इं। उसमें बीड जिला सबसे आगे है। महाराष्ट्र को प्रगतिशील, उन्नत, कृषि क्षेत्र में अग्रणी राज्य कहना और किसानों की आत्महत्या में सबसे आगे रहना, यह अच्छे लक्षण नहीं हैं। कर्ज का बोझ एक भयंकर बीमारी तो है ही, लेकिन किसान बार-बार कर्ज क्यों ले रहा है? कर्ज लेकर भी वह खुद को क्यों नहीं संभाल पा रहा है? इस पर गहराई से विचार करने के लिए सरकार तैयार नहीं है। बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि, सिंचाई का अभाव, कृषि उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) न मिलना, खोखली फसल बीमा योजना ये कारण तो हमेशा के ही हैं। इस वजह से कर्ज लेकर खेती करने पर भी हाथ में कुछ नहीं बचता। एक ओलावृष्टि से तैयार फसल नष्ट हो जाती है। बेमौसम बारिश तो शैतान की तरह पीछे पड़ी है। सरकार खेती के प्रति गंभीर नहीं है, यह किसानों के पतन के पीछे का महत्वपूर्ण कारण है। किसानों की जमीन पर सरकार के उद्योगपति मित्रों की तिरछी नजर है। सरकार लगभग एक करोड़ लोगों को महीने में दस किलो मुफ्त अनाज देती है। इसमें किसान परिवार बड़ी संख्या में हैं। ऐसी ‘मुफ्त’ योजनाएं बनाकर किसान और मध्यम वर्ग के हाथ में भीख का कटोरा देनेवाली योजनाएं ही किसानों के जीवन को नरक बना रही हैं। मोदी और उनके मंत्रिमंडल के पास किसानों के मामले में
दूरदृष्टि का अभाव
है। खेती के मामले में व्यावसायिक दृष्टिकोण नहीं है, दीर्घकालिक नियोजन नहीं है। पिछले २५ वर्षों में तीन बार कर्जमाफी की घोषणाएं होने के बावजूद किसान खुद को संभाल नहीं पाया है। इसके विपरीत किसान आत्महत्याएं बढ़ती ही जा रही हैं। केंद्र और भाजपा शासित राज्य सरकारों को परिसीमन (डिलिमिटेशन) विधेयक में जितनी रुचि है, उतनी किसानों के प्रश्नों में नहीं है। लोकसभा की सीटें बढ़ाना उनका मुख्य उद्देश्य है, लेकिन मराठवाड़ा में मरनेवाला किसान उनकी गिनती में नहीं है। किसान आत्महत्या ‘राजनीतिक’ प्राथमिकता का विषय नहीं बनती, यह गंभीर है। किसान भी मतदाता है। किसान राष्ट्र की रीढ़ है। उसके जीने का प्रश्न हल किए बिना कोई भी राजनीति सफल नहीं होगी। किसानों को धर्म, जाति-पाति में बांटकर सरकार अपनी राजनीति करती है। इसलिए किसान भी उसी में उलझा रहता है और संघर्ष को पूर्णविराम दे देता है, यह आज के महाराष्ट्र का चित्र है। ‘किसान राष्ट्र की रीढ़ है’ ऐसी आहें प्रधानमंत्री मोदी समय-समय पर भरते रहते हैं, परंतु आप उसी किसान को मरने के लिए लावारिस छोड़ रहे हैं, उसका क्या? मोदी किसानों पर कभी काले कानून थोपते हैं, कभी किसानों के अधिकारों का, कृषि उपज का सौदा अमेरिका से करके उन्हें गुलाम बनाते हैं तो कभी किसानों के आंदोलन को आतंकवादियों का आंदोलन बताकर बदनाम करते हैं। देश में क्या या महाराष्ट्र में क्या, किसानों और मजदूरों का जीना नरक की यातनाओं जैसा ही हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी देश में और मुख्यमंत्री फडणवीस महाराष्ट्र में किसानों के दुश्मन बन गए हैं। सरकार को लगता है कि दुश्मनों को जीना ही नहीं चाहिए इसलिए किसान रोज ‘मर’ रहा है। इसी को ‘नरक’ कहते हैं!

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