मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश :  इस ‘बेचैनी’ का कोई पता तो बताए ?

तरकश :  इस ‘बेचैनी’ का कोई पता तो बताए ?

धनुर्धर

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूंढै वन माहि…। कस्तूरी तो हिरण की नाभि में ही रहती है। इस तथ्य से अनजान हिरण उस सुगंध को पाने के लिए बेचैन सा पूरे जंगल की खाक छानता रहता है। कभी इधर तो कभी उधर। कुछ वैसे ही जैसे आजकल डोनाल्ड ट्रंप छान रहे हैं। दुनिया कहती होगी उन्हें महाबली। दुनिया से भी ज्यादा वे खुद कहते होंगे अपने आप को महाबली। लेकिन उससे क्या होता है। उन्हें तलाश तो उस गंध की है, जिसने उन्हें बेचैन कर रखा है। यह गंध वैâसी है, किसकी है, इसे लेकर अलग-अलग विचार हो सकते हैं। बहस इस पर भी हो सकती है कि यह असल में सुगंध है या दुर्गंध, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि इस गंध ने उन्हें बेचैन कर रखा है।
पांव नहीं जम रहे
फिलहाल, इस गंध को लेकर उनकी बेचैनी नरक की उनकी तलाश में देखी जा सकती है। इसी चक्कर में वे कभी आधी रात को वेनेजुएला के राष्ट्रपति भवन पहुंच जाते हैं। कुछ नहीं सूझता तो वहां के राष्ट्रपति को सपत्नीक अपने देश घसीट लाते हैं, लेकिन इस गंध का पता नहीं मिलता। फिर इराक पर धावा बोल देते हैं कि नहीं मिलेगा तो उसे ही नरक बना देंगे। लेकिन नरक बनाना भी इतना आसान थोड़े ही होता है। किसी स्थान को नरक बनाने के लिए वहां पांव तो जमाना पड़ेगा ना। हकीकत यह है कि वहां तो जमाने से पहले ही पांव उखड़ने लग गए।
एक नया ठिकाना
अब बेचारे ने नरक का नया पता तलाश किया है। उनका कहना है कि भारत ही असल में नर्क है। स्वाभाविक ही इससे हमारे वाले उखड़ गए। अपने प्रॉजेक्ट पर ध्यान दो, तुम हमारे प्रॉजेक्ट में क्यों टांग अड़ा रहे हो? ऑब्जेक्शन वाजिब है। हमारा देश स्वर्ग हो या नरक, अपने देश का हम जो भी करें, वह हमारा और हमारे वोटर के बीच का मामला है। उसे हम वैâसे बेवकूफ बनाते हैं, वैâसे उसके आंख-कान बंद करते हैं या उसके मुंह पर पट्टी बांधते हैं, यह हमारी मर्जी है। तुम्हारे पास क्या अपने वोटर नहीं हैं? तुम उन पर फोकस रखो या उन देशों पर ध्यान लगाओ जाओ जहां वोटर होते ही नहीं।
और भी तुनकमिजाज
अब इन नेताओं को कौन समझाए कि जहां वोटर नहीं होते, उन देशों के नेता और भी रिजिड और भी तुनकमिजाज होते हैं। उन्हें डर लगा रहता है कि वे तो अपनी सत्ता बचाने के लिए अपने वोटरों का भी वास्ता नहीं दे सकते। वक्त पड़ने पर उनकी ढाल बनने उनके वोटर खड़े भी नहीं होते। पता चला वोटर का संभावित रोल निभानेवाली पूरी की पूरी प्रजा उछलकर दूसरी तरफ खड़ी हो गई कि हां मारो इसे, निकालो राजमहल से, बहुत दिन चला ली इसने अपनी मनमानी। हर शासक यूक्रेन के जेलेंस्की या इराक के खामेनेई जैसा नहीं होता कि लोग उसे देश की आन-बान-शान से जोड़कर देखने लगें और उसके लिए जान की बाजी लगाने को तैयार हो जाएं।
गलत ब्रांडिंग
बहरहाल, बात उस गंध की हो रही थी, जिसकी तलाश में ट्रंप दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं और सच को पहचान नहीं पा रहे। असल में उनके कन्फ्यूजन की जड़ में है यह तथ्य कि जिस गंध की उन्हें तलाश है, उसकी उन्होंने गलत ब्रांडिंग कर रखी है। दुनिया के दूसरे देशों में जाकर वे ठीक ही नर्क का पता पूछते हैं, लेकिन जब अपने देश में होते हैं तो उसे स्वर्ग की सुगंध बता देते हैं। राष्ट्रपति बनने से भी पहले उन्होंने अपने देश को स्वर्ग जैसा बनाने की बात कहनी शुरू कर दी। मेक अमेरिका ग्रेट अगेन यानी मागा का पूरा प्रॉजेक्ट यही था। यहां भी बात संभल जाती अगर वे आम अमेरिकी लोगों के साथ किए जा रहे इस प्रâॉड को अपने दिमाग में नहीं घुसने देते। अपना फंडा क्लीयर रखते कि लोगों को चाहे जो भी कहा जा रहा हो, असल में यह प्रॉजेक्ट अमेरिका को नरक बनाने का है। गड़बड़ यह हुई कि उन्होंने खुद भी इस प्रॉजेक्ट को स्वर्ग की सीढ़ी मान लिया। अब हो यह रहा है कि उनके इस प्रॉजेक्ट से अमेरिकी समाज में जो गंदगी पैâल रही है, जो दुर्गंध उससे निकल रही है, उसे वे पहचान नहीं पा रहे और नर्क की इस गंध को पाने के लिए दूसरे देशों में मुंह मार रहे हैं।
विश्वगुरु की परिणति
वैसे यह किस्मत अकेले ट्रंप की नहीं है। उनके डियर प्रâेंड भी उसी नियति को प्राप्त होते दिख रहे हैं। विश्वगुरु बनने और बनाने की उनकी आकांक्षा जिस परिणति को प्राप्त होती जा रही है, उसे कोई और रूप देना मुश्किल है।

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