कहूँ किस तरह मुझको आशा नहीं है
निराशा भरी मेरी भाषा नहीं है
वही लक्ष्य है उसको पा के रहेंगे
भले थक गये पर हताशा नहीं है
दमकता है जो कल्पनाओं में मेरी
स्वयं चन्द्र उस चन्द्रमा सा नहीं है
सुधापान कर के भी प्यासे रहे तुम
ये तृष्णा है साथी पिपासा नहीं है
न पर्वत से आये न सागर को जाये
वो कुछ भी हो लेकिन बिपाशा नहीं है।
बहुभाषी शायर – नवीन सी. चतुर्वेदी
