हर-हर महादेव! अरे ओ मोह-माया के पिंजरों में फंसे पंछियो! मणिकर्णिका घाट पर चिताओं की भस्म और गंगा जी की लहरों के बीच बैठकर हम दुनिया के सबसे बड़े रोग, ‘इश्क’, का मुआयना करते हैं। जब दिल में घंटी बजे और अक्ल छुट्टी पर चली जाए, तो समझो पं. प्रेमानंद की शरण में आने का समय हो गया है। आइए, देखते हैं आज कौन से प्रेम पंछी अपने हृदय का रायता लेकर आए हैं!
सवाल १: ‘पंडित जी, हमारी प्रेमिका बात-बात पर रूठ जाती है। ऐसा लगता है जैसे हवा का रुख देखकर मन बदलती है। कोई सिद्ध मंत्र बताइए!’ – अनुराग, बांद्रा
जवाब: वत्स! तुम तो उस अभागे पथिक की भांति हो, जो जलती धूप में छांव ढूंढ़ रहा है और हाथ में छेद वाली छतरी लिए खड़ा है। किसी ने सत्य ही कहा है, ‘त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं, देवो न जानाति कुतो मनुष्यः!’ अर्थात, स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य तो विधाता भी पूरी तरह नहीं समझ पाए, तुम तो फिर भी बांद्रा के बाशिंदे हो! कन्या का रूठना मौसम की पहली बारिश जैसा है, बिना चेतावनी के आता है। इसका मंत्र कोई तंत्र विद्या नहीं, बल्कि तुम्हारी सहनशक्ति में छिपा है। जब वो रूठे, तो तर्क के कुएं में मत कूदो। मौन धारण करो और मिष्ठान (चॉकलेट) की आहुति दो। शास्त्रों का कथन याद रखो: ‘क्रोधं कामेन जेत’, अर्थात गुस्से को प्रेम और धैर्य से ही जीता जा सकता है।
सवाल २: ‘महाराज, हमारी शादी को सात वर्ष हो चुके हैं। अब तो ऐसा लगता है जैसे अनुराधा (पत्नी) से प्रेम कम और दफ्तर जैसी औपचारिकता ज्यादा रह गई है। पुरानी रंगत कैसे वापस लाएं?’ – दीपक, ठाणे
जवाब: हे गृहस्थ! तुम्हारे प्रेम का दिया बुझा नहीं है, बस उस पर गृहस्थी की भस्म जम गई है। एक कहावत तो तुमने सुनी ही होगी, ‘दाल-भात में मूसलचंद!’ शादी के सात साल बाद प्रेम गायब नहीं होता, बल्कि बिजली का बिल, बच्चों की फीस और राशन की पर्ची के पीछे छिप जाता है। संस्कृत की एक अति सुंदर सूक्ति है, ‘सर्वमत्त्यन्तगर्हितम्’ (किसी भी चीज की अति या उसकी उपेक्षा, दोनों ही विनाशकारी हैं)। तुमने प्रेम को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ ले लिया है। अब मणिकर्णिका घाट से सीधा उपदेश सुनो।
