संजय राऊत
`भारत की कई सियासी पार्टियों में तोड़-फोड़ मचाकर उन पर कब्जा करने के बाद, अब ‘टाटा’ को अपने कब्जे में लेने की साजिश शुरू हो चुकी है। ‘टाटा’ की परंपरा, विरासत और विश्वास राष्ट्र निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। उसी ‘टाटा’ को हथियाने के लिए कौन-सी अदृश्य महाशक्तियां चालें चल रही हैं?’
भारत की कई प्रमुख सियासी पार्टियों में फूट डालने के बाद अब दुनिया के मशहूर ‘टाटा’ समूह में फूट डालने की योजना पर अमल किया जा रहा है। यह एक राजनीतिक कार्यक्रम है। अंबानी बंटे, बिड़ला के टुकड़े हुए, लेकिन ‘टाटा’ को तो अब आला दर्जे की साजिश करके तोड़ा जा रहा है। टाटा यानी देश की जनता का महान विश्वास। टाटा को एक राष्ट्रीय औद्योगिक व राष्ट्रीय संस्था ही मानना चाहिए, जिसने देश के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर देश के निर्माण में बहुमूल्य योगदान दिया है।
९ अक्टूबर २०२४ को रतन टाटा का निधन हो गया। ११ अक्टूबर को नोएल टाटा को टाटा ट्रस्ट का अध्यक्ष चुना गया। वे रतन टाटा के सौतेले भाई हैं। जनवरी २०२५ में नोएल को सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट का आजीवन ट्रस्टी नियुक्त किया गया। नोएल टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्ट के नामित सदस्य भी हैं। टाटा संस और टाटा ट्रस्ट का कामकाज महासागर की तरह है। इसलिए कौन कहां है और क्या कर रहा है, यह आम लोगों की समझ से परे है। वे सिर्फ ‘टाटा’ को जानते हैं। टाटा पर उनका विश्वास है। अब जो फूट पड़ी है, वह टाटा ट्रस्ट के अध्यक्ष नोएल टाटा और उसी ट्रस्ट के एक अन्य ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन के बीच है। फिर एन. चंद्रशेखरन के संघर्ष का नया पहलू तो है ही। इस टकराव में शरद पवार जैसे तजुर्बेकार सियासतदान ने नोएल टाटा का साथ दिया है। टाटा ट्रस्ट की महान परंपरा को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए, उनका यह रुख बिल्कुल दुरुस्त है।
बाहर के लोग
रतन टाटा अपने जीवनकाल में बाहर के कई लोगों को ‘टाटा’ में लाए। उनमें से एक वेणु श्रीनिवासन हैं। उन्होंने महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर के पास नोएल टाटा और कुल मिलाकर टाटा द्वारा चलाई जा रही संस्थाओं के खिलाफ अर्जी दाखिल की। टाटा के खिलाफ अर्जी का मतलब टाटा पर कब्जा करने की साजिश का ही एक हिस्सा है, ऐसा खुलकर कहा जा रहा है। टाटा संस और टाटा ट्रस्ट से ‘टाटा’ को ही खत्म करने का फैसला देश की अदृश्य शक्तियों ने कर लिया लगता है। देश की तमाम सार्वजनिक संपत्ति, हवाई अड्डे, बंदरगाह, जमीनें वगैरह अपने उद्योगपति दोस्तों को सौंपने के बाद ‘टाटा’ जैसी संपत्ति भी उन्हीं दोस्तों को देने की यह चालबाजी होनी चाहिए, इस पर कई लोगों की सहमति है। टाटा समूह की मूल कंपनी टाटा संस है और वह एक प्राइवेट कंपनी है। इसमें ६६ फीसदी हिस्सेदारी टाटा की ही अन्य संस्थाओं की है। इसमें दोराबजी ट्रस्ट का हिस्सा २७.९८ फीसदी और सर रतन ट्रस्ट का हिस्सा २३.५६ फीसदी है। ये दोनों मुख्य ट्रस्ट मिलकर टाटा संस के ५१.५४ फीसदी शेयरधारक हैं। इसके अलावा इनसे जु़ड़े अन्य छोटे ट्रस्टों के शेयर मिलाकर यह ६६ फीसदी से ऊपर चला जाता है। इसमें दूसरा बड़ा शेयरधारक शापूरजी पालनजी समूह है। उनका शेयर कैपिटल करीब १८.४ फीसदी है। यानी टाटा संस पर नियंत्रण टाटा ट्रस्ट का है, लेकिन यह नियंत्रण किसी एक व्यक्ति के पास नहीं है, वह ट्रस्ट के पास यानी बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के पास है। रतन टाटा के जीवित रहने तक उनका इस ट्रस्ट पर एकछत्र नियंत्रण रहा। उनके निधन के बाद ट्रस्ट में गुटबाजी पैदा कर दी गई है।
रतन टाटा के बाद बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज में से कुछ लोगों ने टाटा संस का ‘प्राइवेट’ स्वरूप खत्म करने का फैसला किया। नोएल टाटा का रुख साफ है। उनके मुताबिक, रतन टाटा के जमाने में ‘संस’ को प्राइवेट रखने का फैसला सर्वसम्मति से हुआ था, लेकिन नोएल के खिलाफ बाकी ट्रस्टियों ने घेराबंदी कर दी। २४ सितंबर को श्रीनिवासन ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के कामकाज की जांच की मांग चैरिटी कमिश्नर से की और टाटा संस तथा ट्रस्ट के बीच पड़ी फूट जगजाहिर हो गई। रतन टाटा ने जिस वेणु श्रीनिवासन को टाटा में लाकर बड़ा बनाया, अधिकार दिए, उन्होंने ही उनके जाने के बाद टाटा ट्रस्ट के टुकड़े करके मालिकाना हक जताया। जिस तरीके से शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस को तोड़कर दूसरों को ही उन पार्टियों का स्वामित्व दे दिया गया, वही खेल ‘टाटा’ के मामले में हो रहा है। शिवसेना और अन्य पार्टियों को तोड़ते वक्त विधानमंडल के बहुमत को मान्य किया गया, वैसे ही ‘टाटा’ में एन. चंद्रशेखरन, वेणु श्रीनिवासन वगैरह द्वारा तैयार किया गया बहुमत सामने लाया गया है।
अदृश्य महाशक्ति
टाटा ग्रुप पर अदृश्य महाशक्तियां कब्जा जमाना चाहती हैं। इन्हीं महाशक्तियों ने देश को निगल लिया है। वेणु श्रीनिवासन और चंद्रशेखरन उन अदृश्य शक्तियों के मोहरे हैं। ये दोनों लोग एकनाथ शिंदे, अजीत पवार और ऋतब्रत बनर्जी की भूमिका निभा रहे हैं। वेणु श्रीनिवासन ‘टीवीएस’ कंपनी के मालिक हैं और वे नरेंद्र मोदी के बेहद करीबी माने जाते हैं। वेणु श्रीनिवासन पर रतन टाटा का अटूट विश्वास था। सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट में वेणु को रतन टाटा ने ही ट्रस्टी बनाया था। इन दोनों ट्रस्टों के पास ही टाटा संस की लगभग ५२ फीसदी हिस्सेदारी है। २०२५ में वेणु को इन दोनों ट्रस्टों का आजीवन ट्रस्टी और टाटा ट्रस्ट का उपाध्यक्ष बनाया गया। टाटा ट्रस्ट का उपाध्यक्ष होने के नाते वेणु टाटा संस के भी निदेशक हैं। श्रीनिवासन एक उद्योगपति हैं, ‘टीवीएस’ जैसी कंपनी चलाते हैं, लेकिन ‘टाटा’ का चेयरमैन नियुक्त होते ही उनकी ताकत और प्रतिष्ठा बढ़ गई और उन्होंने ही ‘टाटा’ में बगावत की चिंगारी भड़काई। वेणु ने सरकार से मांग की है कि, ‘नोएल टाटा का टाटा ट्रस्ट पर कोई अधिकार नहीं है। नोएल टाटा को ट्रस्ट से बाहर निकालो। नोएल टाटा, रतन टाटा की विरासत को आगे ले जाने जितने सक्षम नहीं हैं। वे कमजोर हैं। नोएल टाटा के बेटे नेविल टाटा को भी ट्रस्ट से बाहर करो। यहां परिवारवाद नहीं चलेगा। टाटा ट्रस्ट की जांच होनी चाहिए। टाटा ट्रस्ट में घोटाले ही घोटाले हैं।’ सच तो यह है कि ‘टाटा’ यह नाम और विरासत एक महान घराने से आई है और टाटा घराने पर, उनकी आने वाली पीढ़ी पर लोगों का विश्वास है। जैसे शिंदे कभी ठाकरे नहीं हो सकते, अजीत पवार कभी शरद पवार नहीं हो सकते, वैसा ही यह मामला है। वेणु श्रीनिवासन की चाल यह है कि शेयर बाजार में टाटा संस की लिस्टिंग कराई जाए, ताकि शापूरजी पालनजी के १८ फीसदी शेयर खरीदकर टाटा पर कब्जा करने का अभियान आगे बढ़ाया जा सके। (इसके पीछे अदृश्य महाशक्तियां हैं।) वेणु कहते हैं कि टाटा में परिवारवाद है, लेकिन खुद वेणु का बेटा ‘टीवीएस’ कंपनी का मालिक है। अंबानी, अडानी का कारोबार उनके बच्चों के पास गया है। तो फिर ‘टाटा’ का कारोबार टाटा के पास ही रहे, टाटा की परंपरा कायम रहे, ऐसा अगर आज के टाटा को लगता है तो इसमें गलत क्या है? ‘टाटा’ कोई वेणु श्रीनिवासन या एन. चंद्रशेखरन द्वारा बनाई गई नहीं है। रतन टाटा द्वारा शुरू की गई यात्रा में वे केवल उनके साथी थे।
अब मुल्क के कॉर्पोरेट, औद्योगिक और सियासी हलकों में जो हलचल दिखाई दे रही है, उसे देखकर साफ है कि शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस और जनता दल (यू) जैसी सियासी पार्टियों पर जिस ‘पैटर्न’ से कब्जा जमाया गया, उसी ‘पैटर्न’ से अब ‘टाटा’ पर भी कब्जा करने की कोशिश जारी है।
क्या टाटा परिवार, उसकी परंपरा और विरासत आगे कायम रह पाएगी?
यह सवाल बेहद अहम है। टाटा का यह विश्वास बरकरार रहना चाहिए!
