हर-हर महादेव! मणिकर्णिका की धधकती चिताओं के बीच एक बार फिर हाजिर है हमारी प्रेम ओपीडी। आइए, देखें आज कौन से दो आशिक अपना पर्चा कटवाने आए हैं!
‘पंडित जी, हमें अपने पड़ोसी से एकतरफा प्रेम हो गया है। पर जब भी सामने आते हैं, तो मुंह से बोली ही नहीं निकलती! कोई ऐसी औषधि बताएं कि बात बन जाए।’
-रोहन, दादर
वत्स रोहन! तुम उस चकोर पक्षी की तरह हो, जो चांद को देखकर सिर्फ आहें भरता है। शास्त्रों में सत्य ही कहा गया है, ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथै:!’ केवल मन में लड्डू फोड़ने से काम नहीं चलेगा। मौन रहने से तो फटी जेब जैसी हालत हो जाती है। पुरानी कहावत है, ‘बिन मांगे तो मोती मिले, मांगे मिले न भीख!’ अगली बार पड़ोसी सामने आए तो हृदय का भय मणिकर्णिका की भस्म बनाओ, चेहरे पर मुस्कान लाओ और कम से कम ‘नमस्ते’ तो बोलो ही। यही प्रेम का प्रथम द्वार है। जब तक द्वार नहीं खटखटाओगे, भीतर का दीप कैसे दिखेगा?
अपनी गर्लफ्रेंड से बुरी तरह परेशान हूं। बार बार एक्स-गर्लप्रफ्रेंड्स के बारे में सवाल करती रहती है!
-विकी, अंधेरी
हे संकटग्रस्त विकी! तुम जलती चिता पर घी डाल रहे हो। इस अमर सूक्ति को गांठ बांध लो, ‘सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्!’ यानी ऐसा सच कभी मत बोलो जो जीवन में तांडव मचा दे। प्रेमिका जब अतीत के पन्ने टटोलती है, तो वो इतिहास की परीक्षा नहीं, सुरक्षा ढूंढ रही होती है। सच बोलना वहां पैर पर कुल्हाड़ी मारना है। तुरंत कहो, ‘तुम्हारे आने से पहले मेरा जीवन कोरा कागज था, असली इतिहास तो तुम्हारे साथ लिखा जा रहा है!’ इतना सुनते ही उनका हृदय पिघल जाएगा और गर्दन कटने से बच जाएगी।
पंडित जी का महाज्ञान
वर्तमान के प्रेम के प्रति सच्चे रहो। अतीत के मुर्दों को मणिकर्णिका पर ही जलने दो, उन्हें घर की बैठक में मत लाओ!
वैधानिक चेतावनी
यह ज्ञान हास्य और लोक-व्यवहार का मिश्रण है। पड़ोसी से ‘नमस्ते’ करने पर चप्पल उड़ती है या घर में महाभारत छिड़ती है, तो उसके जिम्मेदार आप स्वयं होंगे!
इसमें पंडित जी या समाचार पत्र का कोई उत्तरदायित्व नहीं होगा। ऐसी स्थिति में गंगा स्नान करें और प्रभु का नाम लें! भौतिक नशे से हमेशा दूरी बनाकर रखें।
