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रोखठोक : भारत में लोमड़ियों की बारात

संजय राऊत

`तानाशाही के खिलाफ जनता सड़कों पर उतर आई है। आगे भी उतरती रहेगी, पर देश के विचारक, बुद्धिजीवी वगैरह कहां हैं? वे लोमड़ियों की बारात में बैंड बजा रहे हैं। तानाशाह जन्म से ही डरपोक होता है, पर ऐसे तानाशाह को पैदा कौन करता है?’

भारत में तानाशाही का दौर १२ साल पहले शुरू हुआ, पर तानाशाही के खिलाफ जनता अब निडर होकर सड़क पर उतर आई है। न्यायालय, चुनाव आयोग, राष्ट्रपति भवन जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा कर गुजरात के दो व्यापारी पहले सत्ता में आए और फिर तानाशाह बन गए। सोमवार को दोपहर के बाद चुनाव आयोग के कामकाज के खिलाफ लाखों की संख्या में जनता जब दिल्ली की सड़कों पर उतरी तब मोदी-शाह भूमिगत हो गए। उसी समय दिल्ली पुलिस ने आगे से ‘जंतर-मंतर’ पर आंदोलन करने पर रोक का हुक्म जारी कर दिया। यह डर है। इस पर प्रसिद्ध लेखक और व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई कहते हैं, ‘‘तानाशाह मूलत: एक डरपोक आदमी होता है। पांच गधे यदि एक साथ घास खा रहे हों तब भी तानाशाह को डर लगता है कि ये गधे भी उसके खिलाफ साजिश कर रहे हैं। इन एकजुट हुए गधों से उसकी सत्ता पलट जाएगी।’’ मोदी-शाह ने इसी डर से ‘जंतर-मंतर’ पर ताला लगा दिया है, क्योंकि सोमवार को कम से कम चार लाख लोग मोदी-शाह के खिलाफ दिल्ली की सड़कों पर उतरे। तानाशाह डरपोक ही होता है। दिल्ली की सड़कों पर बाधाएं खड़ी करना, आंदोलनकारियों पर केस दर्ज करना, उन पर आरोप लगाना, ये डर के ही लक्षण हैं। हरिशंकर इस पर कहते हैं, ‘‘डर से कांपता तानाशाह अपने चारों ओर ऊंची और फौलादी दीवारें खड़ी कर देता है। जब उसे पता चलता है कि लोग अब उसके झांसे में आने को तैयार नहीं हैं, झूठ को सच मानने को तैयार नहीं हैं, तो वह शहर और राज्य को हथियारबंद पुलिस से भर देता है। पुजारियों, घंटा बजाने वालों, बेरोजगारों को प्रचारक बना देता है और सवाल पूछने वाले हर नागरिक को देशद्रोही घोषित कर देता है।’’ भारत में वही तस्वीर है। दिशाहीन, बेरोजगार, निराश, नकारात्मक सोच से ग्रस्त युवाओं को विध्वंसक, धर्मरक्षक बनाया जाता है। वही धर्मरक्षकों का झुंड तानाशाह का रक्षक बनता है। व्यापारी मानसिकता वाले सत्तालोभी और धर्मांध विचारधारा के लोग इसी झुंड का इस्तेमाल करते हैं। नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने इसी भीड़ का इस्तेमाल कर अपने सिंहासन को मजबूती दी। धर्म सज्जनों को डरपोक बनाता है और पापियों को निडर बनाता है, क्योंकि पापियों को तानाशाह का समर्थन हासिल है।
लोमड़ियों की बारात
भारत में लोकतंत्र की हत्या की जा रही है, तब यहां के विचारक, लेखक वगैरह मंडली कहां हैं, यह सवाल हमेशा पूछा गया।
‘‘इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे लोमड़ियों की बारात में बैंड बजा रहे हैं,’’ यह उस पर परसाई का जवाब है। मोदी के मंत्रिमंडल में कई पुराने, समझदार लोग भी चुप हैं। क्यों? इसका जवाब आगे की छोटी कहानी में है।
स्टालिन की मौत के बाद रूस ने राहत की सांस ली। उसके बाद पार्टी की सभा में निकिता ख्रुश्चेव ने स्टालिन के अतिवादी तानाशाही रवैये पर कड़ी आलोचना की, ‘‘स्टालिन ने लाखों लोगों को मार डाला। विरोधियों को खत्म कर दिया। जेल में डाला। उसने डर का राज बनाया।’’
उस बैठक में कम्युनिस्ट पार्टी का एक कार्यकर्ता खड़ा हुआ और उसने पूछा, ‘‘साहब, आप स्टालिन के साथ इतने साल रहे, तब बोलने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाई?’’
ख्रुश्चेव ने उस आवाज की तरफ देखा और कहा, ‘‘अच्छा, खड़े रहो, मुझे तुम्हारा चेहरा देखने दो।’’ पर कोई खड़ा नहीं हुआ। तब ख्रुश्चेव बोले, ‘‘अब समझ गए न? मैं भी उसी डर की छाया में था। तुम्हारी तरह बोलने के लिए खड़ा होता तो मैं जिंदा नहीं बचता।’’
तानाशाही में डर ही हथियार होता है और वह हथियार गहरा घाव करता है। तानाशाह शुरू में लोकप्रिय ही होता है। वह लोकतंत्र से ही पैदा होता है। लोकतंत्र में उसका सबसे बड़ा दोष क्या है, तो उसकी व्यवस्था में गुणवत्ता को मान्यता नहीं मिलती, लोकप्रियता को मिलती है। उससे चमचे, अंधभक्त पैदा होते हैं। ओशो कहते हैं, ‘‘तानाशाह बाहर से नहीं आता। वह डर और जिम्मेदारी से बचने से जन्म लेता है।’’
नितिन गडकरी, शिवराज सिंह चौहान, राजनाथ सिंह, मोहन भागवत, चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार जैसे लोगों ने लोकतंत्र बचाने की जिम्मेदारी टाली, यह इतिहास में दर्ज होगा।
राज कैसे टिकेगा?
तानाशाही का जिक्र मजबूत और फौलादी नेतृत्व के रूप में किया जाता है। यह सही नहीं है। लोग कहते हैं, ‘‘हिटलर बुरा था। पागल था।’’
हां, पर उसके पागलपन को जन्म किसने दिया? नेतन्याहू ने गाजा पट्टी में हजारों बच्चों की हत्या की। उस नेतन्याहू का समर्थन करने वाले श्रीमान मोदी हैं। ईरान में बच्चियों के स्कूल पर बम गिराने वाले राष्ट्रपति ट्रंप और नेतन्याहू मोदी के मित्र हैं। हिटलर ने यातना शिविर बनाए। कैंप बनाए। स्टालिन ने पूरे रूस को ही ‘कैंप’ बना दिया। इतना बड़ा ‘कैंप’ कि लोगों को पता ही नहीं चला कि वे जेल में हैं। स्टालिन क्रूर था, पर उसे क्रूर बनाने वाले लोग भी क्रूर थे। डर के कारण वे क्रूरता का भजन करते रहे। जब तक लोग डर में जीते हैं, तब तक ‘फौलादी’ तानाशाह बनते रहते हैं।
एक बार एक तानाशाह ने पूछा, ‘‘मेरा राज कैसे टिका रहेगा?’’ उसके सलाहकार ने कहा, ‘‘लोगों को डर दिखाते रहो।’’ तानाशाह बोला, ‘‘डर दिखाने पर भी लोग बोलते हैं।’’
सलाहकार बोला, ‘‘उनके बच्चों के दिमाग भड़का दो। उन्हें धर्म की अफीम दो। उन्हें अपने ही माता-पिता के खिलाफ खड़ा कर दो।’’
तानाशाह बोला, ‘‘वह भी करके देख लिया। फिर भी लोग अब सपने में बोलते हैं।’’
सलाहकार बोला, ‘‘जनता को हुक्म दो कि सपने मत देखो।’’
तानाशाह हंसा और बोला, ‘‘क्या यह संभव है?’’
सलाहकार बोला, ‘‘क्यों संभव नहीं? लोग खुद सोचने से डरते हों तो यह संभव है। उन्हें सपने नहीं आएंगे। समाज निद्राग्रस्त हो जाएगा।’’
…और यह बात सच में हुई। रूस में, चीन में, युगांडा में और भारत जैसे देश में!
श्रद्धा कैसी?
१९७५ से १९७९ आपातकाल का दौर था। इस दौर पर हरिशंकर परसाई ने व्यंग्यात्मक लेखन किया।
‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ नामक उनका एक निबंध है। उसमें उन्होंने अंधभक्ति पर चोट की है।
१९७६ में परसाई का पैर एक हादसे में टूट गया। वे अस्पताल में भर्ती हुए। पैर प्लास्टर में था और लटका कर रखा गया था। इसलिए उन्हें बिस्तर पर ही पड़े रहना पड़ता था। इस दौरान लोग आते और उनके चरण स्पर्श करते। चरण स्पर्श करने वालों की भीड़ बढ़ने लगी। परसाई सोच में पड़ गए, ‘‘अरे बाप रे! यह श्रद्धा अचानक वैâसे पैदा हो गई? मैंने तो हाल में कोई महान काम नहीं किया। दाढ़ी नहीं बढ़ाई। भगवा वस्त्र नहीं पहने। जटाएं नहीं बढ़ार्इं। सिर्फ एक ‘टांग’ टूटी है तो लोगों को लगता है कि मैं अब विकलांग, दयनीय हो गया हूं। इसलिए उस विकलांग पैर को नमस्कार करना चाहिए।’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘क्या मेरे टूटे पैर से वेदना की तरह ही श्रद्धा पैदा हुई है? अगर ऐसा है तो यह विकलांग श्रद्धा है। मुझे पता है, फिलहाल देश में जो माहौल बना है उसमें श्रद्धा की ‘टांग’ टूट गई है। इसलिए मुझे हर कोई यह विकलांग श्रद्धा दे रहा है।’’
हरिशंकर आगे जो कहते हैं वह महत्वपूर्ण है, ‘‘देश में अब शुद्ध श्रद्धा का युग नहीं है। श्रद्धा पुराने अखबार की तरह रद्दी में बिक रही है। विश्वास मनमाने ढंग से गोते खा रहा है। नेता, संस्थाएं, न्यायालय, बुद्धिजीवी… अब किसी पर भी विश्वास नहीं रहा। नेतृत्व नंगा हो रहा है और कुछ नेता तो अंडरवियर में ही घूम रहे हैं। वे निर्लज्ज हैं।’’
हरिशंकर अंधविश्वासियों को अंत में कहते हैं,
‘‘यह चरण स्पर्श करने का समय नहीं है। लात मारने का समय है। मारो एक लात और बनो क्रांतिकारी!’’
पर लोमड़ियों की बारात में बैंड बजाने वालों को यह कौन बताएगा?

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