सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र में स्वास्थ्य सेवा के नाम पर ‘सफेदपोश’ डकैती का एक सनसनीखेज खेल सामने आया है, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया है। पैथोलॉजी लैब में बीमारियों का नहीं, बल्कि मरीजों की जेब और जान की लूट का ‘टेस्ट’ किया जा रहा है। डिस्काउंट के मायाजाल में फंसाकर मरीजों को कौड़ियों के दाम वाली जांच के लिए हजारों रुपए चुकाने पर मजबूर किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस गोरखधंधे में डॉक्टर और लैब संचालकों के बीच ऐसी मिलीभगत सामने आ रही है, जिसमें कमीशन के लिए रिपोर्ट में हेरफेर करने तक से परहेज नहीं किया जा रहा। यह सीधे तौर पर मरीजों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है। सबसे गंभीर पहलू यह है कि जनता के स्वास्थ्य का दावा करने वाली महायुति सरकार ने इस पूरे मामले से दूरी बना ली है। १६ वर्षों से लंबित ‘क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ इस बात की ओर इशारा करता है कि सरकार की चुप्पी ही इस अवैध कारोबार को बढ़ावा दे रही है। अस्पताल और मेडिकल स्टोर के बाद अब पैथोलॉजी लैब भी आम जनता को लूटने का केंद्र बनती जा रही हैं। छत्रपति संभाजीनगर की विभिन्न लैब्स के रेट कार्ड की जांच में चौंकाने वाली अनियमितताएं सामने आई हैं। जिन लिपिड, किडनी प्रोफाइल और एचबीए१सी टेस्ट के लिए आमतौर पर २५०० रुपये लिए जाते हैं, उन्हें १५०० रुपये के ‘फुल बॉडी पैकेज’ में बेचा जा रहा है। स्थिति यह है कि ७५० रुपए का हीमोग्लोबिन टेस्ट मात्र १७५ रुपए में, १२०० रुपये का विटामिन बी-१२ टेस्ट ३०० रुपये में और १४०० रुपए का विटामिन-डी टेस्ट ५०० रुपए में किया जा रहा है। इस भारी अंतर ने जांच की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आशंका जताई जा रही है कि यह ‘डिस्काउंट का मायाजाल’ केवल मरीजों को आकर्षित करने का जरिया है।
