मनोज श्रीवास्तव / लखनऊ
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा राज्यसभा का नामांकन करने के बाद वह लोग ज्यादा छाती पीट रहे हैं जो नीतीश कुमार के राजनैतिक प्रभाव को मिटा कर उनसे बिहार की सत्ता छीनना चाहते थे। चार महीने पहले तक नीतीश बाबू के प्रति जहर उगलने वाले आज उनको लेकर इतना समर्पण दिखा रहे हैं मानों उन्हीं की कृपा से नीतीश कुमार 2025 में भी बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। नीतीश कुमार के नामांकन के बाद उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, विधानसभा चुनाव में बिहार जाकर राष्ट्रीय जनता दल की मिट्टी पलीत करा के लौटे, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा राज्यसभा चुनाव में नामांकन के बाद पहली प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने हालिया सियासी परिस्थिति को अपहरण और फिरौती से जोड़ते हुए भारतीय जनता पार्टी पर तीखी प्रतिक्रिया दी। अपने एक्स एकाउंट पर अखिलेश ने लिखा कि बिहार के इतिहास का सबसे बड़ा अपहरण! ये दिखने में राजनीतिक अपहरण है, लेकिन दरअसल ये बिहार का आर्थिक अपहरण है। भाजपा ने तो फिरौती में पूरा बिहार मांग लिया। अगला नंबर… समझदार को इशारा काफ़ी”। बिहार में यही मनोदशा राजद नेता तेजस्वी यादव की हो गयी है। मायावती और ओवैसी के गठजोड़ से बिहार विधानसभा चुनाव में पस्त हुये तेजस्वी का साथ देने गये अखिलेश यादव 2027 के विधानसभा चुनाव में यूपी उसकी पुनरावृत्त न कर दे इसी भय से डगमगा रहे हैं। वरना जो पार्टी 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में ही कांशीराम नगर समेत बसपा आराध्यों के नाम से बने जिलों का नाम मिटा कर अपना प्रतिशोध लेती हो वह आज कांशीराम का 15 मार्च को प्रदेश के हर जिले में जयंती मनाने को विवश हो गयी है।
फिलहाल, सपा मुखिया उसी दिन से बेचैन हैं जब से भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी को यूपी भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बना कर भेजा है। इससे पहले पिछड़ों की राजनीति को लेकर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य अकेले अखिलेश यादव के हर जोड़-तोड़ को ध्वस्त करते रहे हैं। अखिलेश यादव की घबराहट यह है कि सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के जमाने से ही कुर्मी-लोध और मौर्य सदैव समाजवादी पार्टी के लिये चुनौती रहे हैं। इस समाज के नेताओं ने कभी सैफई परिवार के सामने घुटने नहीं टेका है। यह समाज जब मायावती के साथ गया तो वह गुंडों की छाती पर चढ़ने का नारा देकर 2007 में अकेले अपने दम पर उत्तर प्रदेश की सरकार बना लेती हैं। मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रितत्व काल मे 2 जून 1995 को मीरा बाई राजकीय अतिथगृह में मायावती पर हुये हमले के बाद जाटव समाज समाजवादी पार्टी से सदा-सदा के लिये दूरी बना लिया। गेस्ट हाउस कांड की घटना ने मुलायम सिंह यादव के खौफनाक इरादे को बेनकाब कर दिया। इसके बाद जब 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर लिया तो जहां बसपा प्रत्याशी नहीं थे वहाँ जाटवों ने भाजपा गठबंधन के प्रत्याशी को जिता दिया लेकिन समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों को बुरी तरह पराजित करवाया। परिणामस्वरूप समाजवादी पार्टी को 2014 के लोकसभा चुनाव की भांति 2019 में भी मात्र 5 लोकसभा सीटों पर ही सिमटना पड़ा। बसपा सुप्रीमो मायावती के अनुसार मुलायम सिंह यादव अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिये इस हद तक चले गये थे। वैसे भी मुलायम सिंह यादव ने अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में समाजवादी पार्टी में ऐसे किसी और नेता को नहीं पनपने दिया जो जिनकी जनता में मजबूर पकड़ होती थी । पार्टी स्थापना के समय से जुड़े वह हर दमदार नेता पार्टी में अंदर-बाहर हुये या हाशिये पर धकेल दिये गये जिसके बढ़ते जनाधार को मुलायम सिंह ने अपने लिये खतरा समझा। मुलायम सिंह यादव दूसरी पार्टियों के यादव व पिछड़े नेताओं को कभी मजबूत नहीं देखना चाहते थे। उन्होंने बेनी प्रसाद वर्मा, रमाकांत यादव, उमाकांत यादव, डीपी यादव, भालचंद्र यादव, राम प्रसाद चौधरी, आजमखान, मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, रिजवान जहीर, के अलावा कम्युनिस्ट पार्टी में रहते हुये मित्रसेन यादव, कांग्रेस में रहते राम नरेश यादव की मजबूती रोकने में कोई कोताही नहीं बरती थी। अपने राजनैतिक जीवन में मुलायम सिंह यादव ने वीपी सिंह, चौधरी अजित सिंह, ममता बनर्जी, लालूप्रसाद यादव, कांशीराम, आजमखान, अमर सिंह, शिवपाल सिंह यादव और न जाने कितने लोगों को समय पर राजनैतिक हैशियत का अनुमान कराया है। जो स्वर्ण अक्षरों में आज भी अंकित है। जिसके कारण मुलायम सिंह के जीते जी उनका प्रसिद्ध चरखा दांव उनके हुनर का ब्रांड बन गया था।
अखिलेश यादव भी उसी रास्ते पर चले। मुख्यमंत्री रहते अखिलेश यादव ने सबसे पहले पार्टी पर कब्जा करने के लिये जो-जो हथकंडे अपनाया वह जगजाहिर है। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव व उनके भाई शिवपाल यादव को अपनी लोकप्रियता का एहसास कराते हुये मंच पर ही पार्टी पर कब्जा कर राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये। इससे पहले 2012 से 2017 के बीच अखिलेश यादव ने अपनी सरकार में डॉ अय्यूब की पीस पार्टी और अनुप्रिया पटेल के अपना दल को हड़पने की कोशिश किया था। डॉ अय्यूब के पीस पार्टी के 4 विधायक थे। धीरे-धीरे एक-एक कर तीन विधायक सपा में चले गये। डॉ अय्यूब ने अपने विधायकों के विरुद्ध दल-बदल विधेयक के तहत कार्यवाही करते हुये पार्टी छोड़ने वाले विधायकों की सदस्यता समाप्त करने की मांग किया। विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय का कार्यकाल समाप्त हो गया लेकिन दल-बदल की कारीवाई नहीं हो पाई। यही हश्र अपना दल का भी हुआ। वर्तमान में अखिलेश यादव जब बहुत सारे बसपा नेताओं को तोड़ने का रिकॉर्ड बना लिये हैं तो भी उनका डर समाप्त नहीं हो रहा है। बसपा मूवमेंट के संस्थापक मान्यवर कांशीराम के जमाने से जुड़े इंद्रजीत सरोज, रामअचल राजभर, आरके चौधरी, लालजी वर्मा, त्रिभवन दत्त, डॉ. महेश वर्मा, राम प्रसाद चौधरी, और नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे दिग्गज घुमंतू नेताओं को सपा में लाकर ठहराव दिया है। चूंकि अखिलेश यादव 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजद के लिये पूरी ताकत लगाने के बाद भी मुंहकी खाकर लौटे हैं इस लिये यूपी के 2027 में होने वाली विधानसभा चुनाव ने उनकी धुकधुकी बढ़ गयी है।अगर बिहार में बनने वाले मुख्यमंत्री का सामाजिक गुणा -गणित पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में असर दिखाने वाला बन गया तो सपा-कांग्रेस का हाल वही होगा जो 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में हुआ था।
