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रामायण का अद्भुत प्राक्टय

वैसे तो इतिहास मानवता की अनगिनत कथाओं से भरा पड़ा है परन्तु राम कथा ही एक ऐसी गाथा है जो हर एक के लिए प्रासंगिक है। घर-घर में सुने जाने से पहले ये कथा इतिहास की गुप्त निधि ही रही। “रामायण का उद्भव” एक रोचक कथा है जिसमें समर्पण, जिज्ञासा और सेवा की अद्भुत प्रस्तुति है. गुरु-शिष्य संवाद के माध्यम से शिष्य को भगवान राम के चरित्र के विभिन्न आयामों का ज्ञान मिला, गुरु ने शिष्य को भगवान राम की महिमा का प्रचार करने का निर्देश दिया। शिष्य असमंजस में था कि निर्देश का पालन कैसे किया जाए, तभी एक ऐसी घटना घटी कि शिष्य क्षुब्ध हो गया और यही घटना रामायण ग्रंथ के आने का आधार बनी जो अनादि-काल से जीव के लिए मुक्ति का साधन है। इस प्रसंग में शिष्य महर्षि वाल्मीकि थे एवं गुरु और कोई नहीं, बल्कि त्रिलोकी नारद मुनि।

संवाद जिससे महाकाव्य का मार्ग प्रशस्त हुआ:
रामायण महाकाव्य की रचना एक प्रश्न से हुई। महर्षि वाल्मीकि अपने आश्रम में ध्यानमग्न थे, वे धरती पर उत्कृष्ट तम जीव के बारे में विचार कर रहे थे उसी शुभ मुहूर्त में देवऋषि नारद का वहाँ आगमन हुआ, वाल्मीकि जी ने इस शुभ अवसर का लाभ उठाते हुए उनसे एक ऐसा प्रश्न किया जिसने मानव इतिहास की दिशा बदल दी।
को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् |
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ||
चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः |
विद्वान् कः कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः ||
आत्मवान् को जितक्रोधो द्युतिमान् कोऽनसूयकः |
कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे ||
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे |
महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम् ||
(बाल काण्ड : 1.1.2-5)
भावार्थ: नारद जी, इस धरती पर कौन ऐसा व्यक्ति है जो गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, सत्यवादी और परोपकारी है? जिसे अपने क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण हो, जो दृढ़ निश्चयी, मृदुभाषी और शांत हो, जो बुद्धिमान हो,राग-द्वेष से परे हो और जिससे युद्ध करने के विचार से ही देव और असुर सभी थर-थर काँपते हों? हे! देवर्षि, आप ही इस तरह के व्यक्ति को जानने में सक्षम हैं, और मैं आपसे ऐसे बहु आयामी व्यक्तित्व के बारे में जानना चाहता हूँ।
नारद मुनि मुस्कुराए और बोले :
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतूसः |
भावार्थ – “इक्ष्वाकु वंश में जन्मे राम ही ऐसे एक मात्र पुरुष हैं।” उन्होंने श्रीराम के गुणों और जीवन की कथा विस्तार से सुनाई। राम के अद्भुत व्यक्तित्व को सुनकर वाल्मीकि अचंभित रह गए, इसी अंकुर से प्रेरित होकर रामायण की रचना प्रारंभ हुई परन्तु उसे किस रूप में प्रस्तुत किया जाए ये तय होना अभी भी बाकी था।

शोक से उपजा श्लोक
कुछ समय बाद वाल्मीकि अपने शिष्य भारद्वाज के साथ एक दिन तमसा नदी पर स्नान करने गए हुए थे। उन्हे तमसा का जल किसी साधक की आत्मा जैसा स्वच्छ और शुद्ध लग रहा था, जब वे वन की प्राकृतिक सुंदरता और नीरवता का आनंद लेते हुए शांत मन से आश्रम लौट रहे थे तभी उन्होंने एक क्रौंच पक्षी के जोड़े को देखा जो प्रेमालिप्त था। वे तन्मयता के साथ एक दूसरे के आलिंगन में आबद्ध थे, तभी वहाँ से गुजरते हुए एक शिकारी ने नर पक्षी को मार दिया।वाल्मीकि उस शिकारी के इस मूर्खतापूर्ण हिंसक कृत्य से अत्यंत दुखी हुए, मादा पक्षी का विलाप देखकर वाल्मीकि का हृदय करुणा से भर गया और उनके मुख से स्वतः एक शापपूर्ण वाक्य निकला –
“मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः | यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ||”
भावार्थ: हे निषाद ! तुम्हें भी कभी सुख और शांति प्राप्त न हो क्योंकि तुमने निर्दयता से क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक (नर) पक्षी को उस समय मारा है जब वो कामासक्त होकर प्रेमरत था।
वाल्मीकि अचंभित थे कि दुख में उनके मुख से निकले इस वाक्य को क्या कहा जाए, उन्होंने शोक से निकले इस वाक्य को श्लोक का नाम दिया और यहीं से काव्य की धारा प्रवाहित हुई। भगवान के भक्त के हृदय में सभी जीवों के प्रति समान रूप से करुणा होती है, वाल्मीकि का क्रोध भी व्यक्तिगत रूप से निषाद के ऊपर नहीं था बल्कि वे मासूम प्रेमरत क्रौंच पक्षियों की पीड़ा से व्यथित थे यह स्वार्थ-रहित अन्य जीवों के प्रति सहानुभूति ही पवित्र भक्ति का सूचक है। वाल्मीकि की तरह ही भक्तों का हृदय इतना कोमल होता है कि वह दूसरे जीवों की पीड़ा को भी स्वयं की पीड़ा की तरह अनुभव करता हैं, चाहे वह मनुष्य हो या पशु।
जैसा कि श्रीमद् भागवतम् -3.25.21 में भक्तों के बारे में वर्णित है-
तितिक्षव: कारुणिका: सुहृद: सर्वदेहिनाम् ।
अजातशत्रव: शान्ता: साधव: साधुभूषणा: ॥
भावार्थ: भक्त सभी जीवों के प्रति सहानुभूति रखते हैं एवं दयालु और मित्रवत् होते हैं। वे शांत, पवित्र और शास्त्रों का पालन करने वाले होते हैं, उनका कोई शत्रु नहीं होता।
वाल्मीकि का पक्षियों की पीड़ा देखकर व्यथित होना, उनके जन्मजात वैष्णव होने का प्रमाण है।

सृष्टी निर्माता ब्रह्माजी का आदेश
आश्रम लौटने पर वाल्मीकि का हृदय उद्विग्न था उनके दिमाग में वही श्लोक घूम रहा था। तभी उनके समक्ष स्वयं ब्रह्मा जी प्रकट हुए, वाल्मीकि ने उनका अभिवादन किया और उन्हें अपने आश्रम में ले आए, अंतर्यामी ब्रह्मा जी वाल्मीकि के अंतर्मन में चल रही दुविधा को समझ गए और बोले:
मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती |
रामस्य चरितं सर्वं कुरु त्वमृषिसत्तम || (बालकांड 1.2.31)
भावार्थ – “हे महर्षि, तुम्हारे मुख से सरस्वती ने ये शब्द मेरी इच्छा से ही उच्चारित करवाए हैं, क्योंकि अब तुम्हें राम के चरित्र का विस्तार से वर्णन करना है। ब्रह्मा जी ने बताया कि उनकी ही इच्छा से वाल्मीकि के मुंह से वह श्लोक निकला क्योंकि वे चाहते थे कि वाल्मीकि मुनि भगवान श्री रामचंद्र की लीलाओं की महिमा का एक दिव्य संग्रह “रामायण”
लिखें। ऋषि वाल्मीकि को भगवान की दिव्य लीलाओं का महिमा मंडन करने और उन्हें कविता के रूप में पिरोने की दिव्य इच्छा को पूरा करने के लिए एक माध्यम के रूप में चुना गया था, ताकि भक्त और सज्जन, सभी इसका आनंद ले सकें। भगवद् गीता (10.9) में कृष्ण कहते हैं:
मच्च‍ित्ता मद्ग‍तप्राणा बोधयन्त: परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ 9 ॥,
“मेरे शुद्ध भक्तों के विचार हमेशा मुझमें ही रत रहते हैं, वे मेरी सेवा में ही लगे रहते हैं, और उन्हें हमेशा शास्त्रों पर एवं मेरे बारे में चर्चा करके संतुष्टि और आनंद प्राप्त होता है।” भक्त की मूल रुचि
भगवत चर्चा करने की होती है और वे भगवान के ऐश्वर्यों को दूसरों के बीच प्रचारित करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं, ऋषि वाल्मीकि ने तो सिर्फ़ भगवान राम का पवित्र नाम जपकर यह योग्यता हासिल की है, और तो और उन्होंने ऋषि नारद के कहने पर “मरा-मरा” जपना शुरू किया था क्योंकि वे राम राम जपने में अपने आप को असमर्थ पा रहे थे, इस तरह उन्होंने श्रीमद भागवतम् 6.2.14 को भी सत्यापित किया :
साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा।
वैकुण्ठनामग्रहणामशेषघहरं विदुः॥
अर्थात जो कोई भी संकेत से (किसी और बात का संकेत देने के लिए), मजाक में, संगीत के मनोरंजन के लिए, या लापरवाही से भी पवित्र नाम का जप करता है, वह सभी पापों के फलों से तुरंत मुक्त हो जाता है। शास्त्रों के सभी विद्वान यह स्वीकार करते हैं। ब्रह्मा जी ने फिर वाल्मीकि को निर्देश दिया कि वे नारद ऋषि से सुनी राम कथा को यथावत प्रस्तुत करें । वाल्मीकि असमंजस में थे क्योंकि भगवान राम की लीलाएँ तो अपरंपार थीं, अत: ब्रह्मा जी ने वाल्मीकि को आश्वस्त किया कि “राम-लक्ष्मण के रोमांचक लीलाएं, राक्षसों के कुकृत्य और यहाँ तक कि वैदेही की दुर्दशा जिससे अब तक सभी अनभिज्ञ थे, सभी प्रसंग आपको यथासमय ज्ञात हो जाएंगे, भले ही आपको अब तक उनकी जानकारी न हो”। वाल्मीकि मुनि के मन में फिर संशय हुआ कि भगवान तो स्वतंत्र हैं, अगर मैं लिख दूँ और भगवान वह लीला न करें, तो क्या होगा? अत: अंतर्यामी ब्रह्मा जी ने महर्षि वाल्मीकि को पुन: भरोसा दिलाया कि इस कथा को कहते हुए तुम्हारी वाणी से निकले शब्द असत्य नहीं होंगे। इस प्रसंग से पुन: स्थापित होता है कि भगवान जो पूरी तरह स्वतंत्र हैं, वे भी वाल्मीकि मुनि जैसे अपने सच्चे भक्त के आधीन होते हैं, वे भले ही कभी-कभार अपना किया हुआ वादा पूरा न करें, परंतु वे अपने भक्तों की कही बातों को अवश्य सत्यापित करते हैं यही बात श्री मद् भागवतम् (7.8.17) में भी कही गई है:
सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितं (सत्यं विधातुं निज-भृत्य-भासिटं).
अर्थात अपने सच्चे भक्त के कथन को सत्य सिद्ध करने के लिए परमेश्वर सर्वत्र विद्यमान रहते हैं। इसके उपरांत ब्रह्मा जी ने वाल्मीकि को आशीर्वाद दिया कि जब तक यह सृष्टि रहेगी, तब तक
रामायण और वाल्मीकि का नाम तीनों लोकों में सदैव अमर रहेगा। रामायण की रचना ब्रह्मा जी की प्रेरणा से एवं नारद मुनि के आशीर्वाद से श्रीराम का समस्त चरित्र और महिमा वाल्मीकि के हृदय में प्रकट हुए और ब्रह्मा जी के निर्देशानुसार उन्होंने 24,000 श्लोकों में रामायण की रचना की जिसमें भगवान राम की लीलाओं का क्रम से विस्तार में वर्णन हुआ। यह कथा मात्र न होकर धर्म और भक्ति की एक ऐसी निर्देशिका है जिसका पालन कर मनुष्य जीवन मरण के चक्र से मुक्त हो सकता है।

लव–कुश प्रथम रामकथा वाचक
जब यह ग्रंथ तैयार हो गया तो वाल्मीकि की नयी चिंता थी कि इस अमूल्य ग्रंथ को कौन प्रचारित करेगा? तभी लव और कुश उनके समक्ष आए और उनको प्रणाम किया, वे वाल्मीकि के आश्रम में ही वेद की शिक्षा लेते थे, उनकी आवाज सुरीली थी और वे श्रीराम–सीता के पुत्र थे। उनके ये सभी गुण देखते हुए वाल्मीकि ने उन दोनों को महाकाव्य रामायण याद करने को कहा। उन्होंने रामायण को कंठस्थ किया और अपनी मधुर वाणी से इसे गाना आरंभ किया। ऋषियों की सभा में जब उन्होंने रामायण को गाया तो सब मंत्रमुग्ध हो गए। यही से रामायण जन-जन तक पहुँची और आज भी हर जगह गायी जाती है।

रामायण किसी स्थान विशेष तक सीमित कहानी नहीं है; यह पूरे विश्व में भक्तों के दिलों पर राज करती है जो सीमाओं, भाषाओं और काल से परे है। रामायण के इस जबरदस्त आकर्षण के कारण ही भगवान की लीलाओं को अनेक भाषाओं में गाया जाता हैं। दक्षिण भारत में मधुर कम्बा रामायणम (तमिल) अपनी उत्कृष्ट कविता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति के कारण प्रसिद्ध है वहीं उत्तर भारत में हर घर में गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस पढ़ी जाती हैं। भारत के सुदूर पूर्व में यह
महाकाव्य थाईलैंड का रामकीन राष्ट्रीय महाकाव्य है, इंडोनेशिया में काकाविन रामायण, कंबोडिया में रीमकर और मलेशिया में यही राम कथा हिकायत सेरी राम में बदल जाती है। बाली के उत्सवों से लेकर अंगकोर वाट की पत्थर की नक्काशी तक, राम की कहानी एक वैश्विक धरोहर है। हालांकि, इस दिव्य वृक्ष की अलग-अलग कई शाखाएं हैं, लेकिन जड़ एक ही है, सभी वाल्मीकि रामायण पर ही आधारित हैं जिसे अमर रचनाकार ऋषि वाल्मीकि ने बनाया था।

राम रस सार
बाल कांड (1.1.18) में नारद मुनि बताते हैं, “यह वेदों की विद्या पर आधारित पवित्र ग्रंथ रामायण, पाप नाशक और मंगलकारी है। इस राम कथा को पढ़ने से पाठकों के पापों का नाश होगा।” इसलिए हम सभी को रामायण के इस शाश्वत ज्ञान की शरण लेनी चाहिए जो हमें धर्म का मार्ग दिखाता है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक ज्ञान के लिए कैसे जिज्ञासु होना चाहिए और आध्यात्मिक खोज में कितना विनम्र होना चाहिए। वाल्मीकि जी विनम्र और जिज्ञासु थे तथा उनकी तीव्र इच्छा को देखते हुए नारद मुनि ने उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान दिया और ब्रह्मा जी ने वाल्मीकि को रामायण लिखने का निर्देश दिया। वाल्मीकि ने अपने गुरु की शिक्षा को अपने हृदय में आत्मसात कर लिया और उनके निर्देशों को पूरा करने के लिए माध्यम बने। तीव्र लालसा के चलते, उनकी हर बात सीधे उनके हृदय को उतरी और इसी कारण रामायण एक दिव्य महा ग्रंथ बना। यह नहीं भूलना चाहिए कि वाल्मीकि को इसलिए चुना गया क्योंकि वह भगवान राम का पवित्र नाम जपकर पवित्र हो गए थे। आइए हम भी महर्षि वाल्मीकि के चरणों में प्रार्थना करें कि हमारे रोम-रोम में भी भगवान कृष्ण और भगवान राम के पवित्र नाम का वायस हो जाए, ताकि हमारा मलिन  मन स्वच्छ हो और भगवान के धाम वापस जा सकें।
रामायण केवल एक कथा नहीं, अपितु दया, धर्म और भक्ति का अमर संदेश है। यह हमें बताती है कि आत्म ज्ञान की प्राप्ति जिज्ञासा, गुरु की सेवा और करुणा से होती है। वाल्मीकि ने अपने शोक को श्लोक में बदलकर संसार को एक अमूल्य धरोहर दी। -‘गीता मनीषी’ देवशेखर विष्णु दास

आध्यात्मिक परिचय:
प पू. गोपाल कृष्ण गोस्वामी के शिष्य हैं और अयोध्या के मूल निवासी हैं। वह एक बी.टेक. स्नातक हैं और उन्होंने ऑनलाइन माध्यमों से दस लाख से अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ताओं को भगवद गीता की शिक्षा दी है। वह वर्तमान में इस्कॉन अयोध्या के परियोजना निदेशक (प्रोजेक्ट डायरेक्टर) के रूप में कार्यरत हैं और इस्कॉन के प्रवक्ता हैं, साथ ही मायापुर संस्थान में एक संकाय सदस्य (फैकल्टी मेंबर) भी हैं।

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