मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : बहू-भोज

अवधी व्यंग्य : बहू-भोज

एड. राजीव मिश्र मुंबई

मनोरथ के बिटवा के बियाह के आज तिसरा दिन है। आज उनके घर पूरे गांव के खाना है। सुबह से गोबर्धन तीन बेरी मनोरथ के घर के चक्कर लगाय चुके हैं अउर का-का बनि रहा है ओहिके सूचना अपने घर में देइ रहें हैं। जब पचवीं बार गोबर्धन चक्कर मारें तो मनोरथ पुछि बइठे, का हो गोबर्धन का जांच-पड़ताल कइ रहे हौ? वइसे तो केउ के काज परोजन में देखाई नही पड़त हौ, आज का होइ गवा। कुछौ नही हो मनोरथ ! अब पड़ोसी धरम भी न निभाई का? देखि रहें है कि कउनउ काम धाम होय तो अब परोसी, परोसी के काम नही आई तो के आई। वइसे बेवस्था तो बहुत धाकड़ कइ रहे हो भयवा। बस एक चीज के कमी देखाय रही है। गुलाब-जामुन नही बनवायो। का बताई गोबर्धन! बड़कना के बियाह में गुलाब-जामुन बनवाये रहे पर एक-एक अदमी १०-१० गुलाब जामुन खाए रहें। नही हम तो सातय खाये रहे। हां तो खतम होइ गवा होहिहै नही तो तुम्हरे जइसन भुक्खड़ अदमी गुलाब जामुन के भगौना तक चाटि जात हैं। तुम्हरी मजाक के आदत कब्भौ छुटी नही। इतना कहिके गोबर्धन खींस निपोरत अपने घर की ओर निकरि पड़े। सांझि के जइसय खाना शुरू भवा पूरा गांव बफर सिस्टम पर टूटि परा। एक-एक मनई प्लेट में इतना खाना भरि लीहें हैं कि ऊपर से चिप्स के एक ठो टुकड़ा भी डरिहौ तो भुंई गिरि परी। थोड़ी देर में गोबर्धन के कान में गांव के कउनउ लड़िका कहिके गए, दद्दा तुम बस दाल-चाउर खाओ उहां बस जलेबी अउर गाजर के हलुआ खाय रहें हैं बस थोड़ा से बचा अहइ हमका लागत है जब तक तुम गुलाब जामुन तक पहुंचिहो तब तक उहौ खतम होइ जाई। इतना सुनतइ गोबर्धन लोगन के धकियावत काउंटर तक पहुंचें तो उनकर दशा संपूर्ण भोज के पोस्टर की तरह होइ गा रही। अउर तो अउर जब उहां पहुंचे तो गुलाब जामुन खतम होइ ग रहा बस भगौना में चाशनी गोबर्धन के मुंह चिढ़ाय रही है। एक लोटा में उहै बची हुई चाशनी गोबर्धन पी गए। आज भोज के तीन दिन बीति गवा है पर तब से लइके आज गोबर्धन लोटा लइके खेतय में दिखाई पड़ि रहें हैं।

अन्य समाचार