मुख्यपृष्ठस्तंभबेबाकबेबाक : देश के हिंदू बंटे, पड़ोसी देश सटे!..क्या यही है सरकार...

बेबाक : देश के हिंदू बंटे, पड़ोसी देश सटे!..क्या यही है सरकार का ‘सनातनी’ विकास का एजेंडा?

 अनिल तिवारी, मुंबई

पिछले एक दशक से देश के हिंदुओं को लगातार एक-दूसरे के सामने खड़ा किया जा रहा है। जाति के विरुद्ध जाति को हथियार बनाया जा रहा है। नतीजा यह हुआ है कि आज देश का हिंदू तमाम वर्गों में बंट चुका है, वहीं दूसरी ओर न केवल देश का मुस्लिम एकजुट हो रहा है, बल्कि हमारे पड़ोसी मुस्लिम मुल्क भी एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। इसे मोदी सरकार की साम, दाम, दंड, भेद की नीति की महा‘विजय’ न कहा जाए तो और क्या कहें?
धार्मिक ध्रुवीकरण का खेला
देश में मोदी सरकार को आए १२ साल पूरे होने जा रहे हैं। इस बीच धार्मिक ध्रुवीकरण का जमकर खेल खेला गया पर हिंदुओं के उत्थान, सामाजिक समरसता और रोजगार के अवसर पैदा करने पर सरकार ने कभी भी कोई भी तवज्जो देना ठीक नहीं समझा। जनता का ध्यान इन विषयों पर केंद्रित हो और वो इस पर सवाल उठाने की पहल ही न कर सके, इसके लिए पिछले दशक भर से उसे गैरजरूरी धार्मिक मसलों में उलझाए रखा गया, पर यहां यह तक बताने का प्रयास नहीं हुआ कि चलो हिंदुत्व पर ही सही सरकार की उपलब्धियां जान लो। हिंदुओं का जीवन स्तर सुधर सके, उन्हें विकास पथ पर अग्रसर किया जा सके या उनकी आनेवाली पीढ़ियों का भविष्य उज्जवल और सुरक्षित हो सके, इसके लिए सरकार ने जो-जो काम किए हैं उनका ब्योरा यह है। इसके उलट हुआ यह कि गली से लेकर दिल्ली तक हिंदुओं के एक गट्ठा वोट लेने के बाद अब उन्हें आपस में लड़ाने के लिए यूजीसी जैसे विवादित कानूनों को थोपा जा रहा है। छात्र जीवन से ही उनके बीच जातिगत द्वेष का बीज बोया जा रहा है और जब उस पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जैसे सत्ता आलोचक, समीक्षक संन्यासी द्वारा सवाल उठाया जाता है तो उन्हें ट्रोल किया जा रहा है। उनके बारे में अपशब्द कहे जा रहे हैं और उनकी छवि धूमिल की जा रही है। तर्क दिया जा रहा है कि संत-संन्यासी को राजनीति से दूर रहना चाहिए। यदि ‘भक्तों’ के इस तर्क को मान भी लिया जाए तो सबसे पहले उन्हें योगी आदित्यनाथ से इस्तीफा मांगना चाहिए था। साध्वी उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और प्रज्ञा सिंह से सवाल पूछना चाहिए था। भाजपा में साधु-संन्यासियों की लंबी फेहरिस्त है। ऐसी फेहरिस्त जिन्होंने संन्यास लेकर न केवल विधिवत राजनीतिक पार्टी में प्रवेश किया, बल्कि संवैधानिक पदों को स्वीकार भी किया। मंत्री-मुख्यमंत्री पद का सुख भी भोगा। जब यह सब जायज था और है तो फिर किसी शंकराचार्य का सत्ता के त्रुटिपूर्ण निर्णयों पर सवाल उठाना कैसे गलत हो सकता है?
अब पीड़ा क्यों?
धर्म शिरोमणि और सत्ता का हमेशा से चोली-दामन का साथ रहा है। पुरातन काल से राजा-महाराजा अपने राज दरबार में राज गुरुओं की ससम्मान नियुक्ति करते आए हैं। प्रागैतिहासिक काल से यह परंपरा चली आ रही है। त्रेता हो या द्वापर, सप्तऋषि और महर्षि राजाओं को उचित-अनुचित का बोध कराते आए हैं। उनके राजनैतिक फैसलों में शामिल रहे हैं, फिर भला शंकराचार्य की समीक्षात्मक टिप्पणियों से आज की सत्ता और सत्ता सुख से लाभान्वित लोगों को पीड़ा क्यों होती है? क्या कोई भी एक ऐसा विषय है जिस पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का कोई कथन राष्ट्रविरोधी या धर्म विरोधी प्रतीत हुआ हो। उन्होंने यूजीसी का मुद्दा उठाकर भला गलत क्या कहा है? जब आप मंच से कहते ही हो ‘कटोगे तो बंटोगे’ तब यथार्थ में आप हिंदुओं को बांटने के तमाम कदम क्यों उठाते हो? ध्रुवीकरण के हर संभव प्रयास क्यों करते हो। हिंदू तो हमेशा से सहिष्णु रहा है। उस पर ध्रुवीकरण का सम्मोहन ज्यादा समय तक नहीं रहता पर आपकी तुच्छ राजनीति से मुस्लिम समाज जरूर कट्टर और हिंदू विरोधी होता जा रहा है। यह सनातन सच है।
फेल कूटनीति
आज मुस्लिम समाज के बच्चे से लेकर बूढ़े तक धर्म के नाम पर एकजुट होने लगे हैं। हाल के चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी की जीत और मुल्ला-मौलवियों के जहरीले बयान इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। फिर भी यदि सत्ता जागती न तो तब किसी धर्म शिरोमणि को ही बीड़ा उठाना पड़ता है।
आज देश का अधिकांश मुस्लिम दृढ़ता के साथ हिंदुओं के विरोध में खड़ा है और पड़ोसी देशों का मुस्लिम भी एकजुट और आक्रामक हो रहा है। बांग्लादेश में हिंदुओं की जघन्य हत्याएं और हिंदुस्थान विरोधी लहर इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उस बांग्लादेश में यह सब हो रहा है, जिसे यदि हिंदुस्थान ने मुक्ति नहीं दिलाई होती, आजादी नहीं दिलवाई होती तो निश्चित तौर पर पाकिस्तान उन बंगाली मुसलमानों को पैरों तले कुचल चुका होता। यदि उस बांग्लादेश में हिंदुओं का दमन होता है और वो बांग्लादेश अपने दुश्मन पाकिस्तान से हाथ मिलाता है, १४ साल बाद वहां फिर से सीधा हवाई संपर्क स्थापित करता है तो यहां हिंदुओं के तथाकथित सरकार के ‘हवाई’ दावों की पोल खुल जाती है। उसकी कूटनीतिक हार पर से पर्दा उठ जाता है। हिंदुस्थान ने आजादी के बाद से लगातार अपने पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध बनाए रखे थे तो केवल अपनी कूटनीतिक समझ से! आज वो रिश्ते तबाह हो चुके हैं। तहस-नहस हो चुके हैं। हिंदुस्थान का हर एक पड़ोसी आज हिंदुस्थान से दूर जा चुका है। हमारा बैरी हो चुका है और अब नंबर आया है तो हिंदुओं को हिंदुओं से दूर करने का। क्या यही इस सरकार का सनातनी ‘विकास’ का मॉडल है? इस पर सवाल तो उठना ही चाहिए।

अन्य समाचार