मुख्यपृष्ठस्तंभसम-सामयिक : लंबा युद्ध ईरान के पक्ष में समीकरण झुका सकता है?

सम-सामयिक : लंबा युद्ध ईरान के पक्ष में समीकरण झुका सकता है?

विजयशंकर चतुर्वेदी

हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते दबाव, ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता और अमेरिका-इजरायल के भीतर उठती राजनीतिक बहसों के बीच, पश्चिम एशिया का संघर्ष एक नए रणनीतिक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। प्रश्न यह है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो क्या क्षेत्रीय शक्ति संतुलन धीरे-धीरे ईरान के पक्ष में झुक सकता है।
पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल संग अमेरिका के बीच जारी टकराव, अब केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा, ऊर्जा आपूर्ति पर मंडराते वैश्विक खतरे और देशों के भीतर गहराते तनाव के बीच एक बड़ा रणनीतिक सवाल उभर रहा है— यदि यह युद्ध लंबा खिंच गया तो क्या शक्ति संतुलन बदल जाएगा? क्या वह ईरान, जिसे शुरुआती चरण में अपेक्षाकृत कमजोर माना जा रहा था, दीर्घकालिक संघर्ष में अधिक टिकाऊ साबित हो सकता है?
सामान्य सैन्य तुलना में अमेरिका और इजरायल की क्षमता ईरान से कहीं अधिक उन्नत है। उनके पास अत्याधुनिक वायुसेना, उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणाली, उपग्रह आधारित निगरानी नेटवर्क और वैश्विक सैन्य गठबंधनों का व्यापक ढांचा है। इसके विपरीत ईरान की पारंपरिक सैन्य शक्ति अपेक्षाकृत सीमित है। उस पर लंबे समय से प्रतिबंध भी लगे हुए हैं, साथ ही हॉर्मुज की बंदी उसे भी अवश्य प्रभावित करेगी और कोई भी देश उसे प्रत्यक्ष सैन्य सहायता देता नहीं दिखता। लेकिन आधुनिक युद्ध का अनुभव यह भी बताता है कि केवल तकनीकी श्रेष्ठता ही निर्णायक नहीं होती। कई बार परिणाम उसके पक्ष में चला जाता है जो समय, संसाधन और राजनीतिक दबाव को अधिक समय तक झेल सके।
इस पूरे संघर्ष में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक तथ्य सामने आया है—हॉर्मुज जलडमरूमध्य। फारस की खाड़ी से गुजरने वाला यह समुद्री मार्ग विश्व के लगभग पांचवें हिस्से के तेल के परिवहन के लिए जाना जाता है। विभिन्न ऊर्जा आकलनों के अनुसार प्रतिदिन लगभग दो करोड़ बैरल से अधिक कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद इसी मार्ग से होकर विश्व बाजारों तक पहुंचते हैं। युद्ध की परिस्थितियों में इस मार्ग से जहाजोेंं की आवाजाही बाधित हो गई है और बीमा तथा शिपिंग कंपनियों ने इसे उच्च जोखिम वाला क्षेत्र मानना शुरू कर दिया है।
ऊर्जा आपूर्ति की बाधा वैश्विक बाजारों में अस्थिरता पैदा कर सकती है। चूंकि दुनिया के लगभग हर क्षेत्र में अमेरिकी आर्थिक और सुरक्षा हित जुड़े हुए हैं इसलिए ऊर्जा बाजारों की उथल-पुथल वॉशिंगटन पर यह दबाव भी बढ़ा सकती है कि वह अपने कदमों का दायरा सीमित रखे।
इसी बीच अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठान की कुछ अंदरूनी रिपोर्टों में कहा गया है कि यदि ईरान के साथ उच्च तीव्रता वाला संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो अमेरिकी मिसाइल भंडार पर दबाव पड़ सकता है। आधुनिक युद्धों में उपयोग होने वाली प्रिसिजन मिसाइलें और एयर-डिफेंस इंटरसेप्टर अत्यंत महंगे और जटिल हथियार होते हैं। इन्हें बड़ी संख्या में तुरंत तैयार करना आसान नहीं होता।
सस्ते हमले, महंगी रक्षा
उधर ईरान की सैन्य रणनीति अलग प्रकार की रही है। उसने पिछले वर्षों में अपनी सैन्य क्षमता का बड़ा हिस्सा बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और ड्रोन के बड़े पैमाने पर उत्पादन पर केंद्रित किया है। इन हथियारों की लागत कम होती है और इन्हें अपेक्षाकृत जल्दी तैयार किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि युद्ध के दौरान जवाबी हमलों की उसकी क्षमता बरकरार रह सकती है।
यदि किसी ड्रोन या मिसाइल को रोकने के लिए दो या तीन इंटरसेप्टरों की आवश्यकता पड़ती है तो रक्षा लागत और संसाधनों दोनों पर दबाव बढ़ जाता है। यह स्थिति इजरायल के लिए एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती में बदल सकती है।
हालांकि, इजरायल के साथ खड़े अमेरिका के पास विशाल रक्षा बजट, विकसित रक्षा उद्योग और सहयोगी देशों का व्यापक नेटवर्क है। लेकिन केवल इन्हीं कारकों के आधार पर युद्ध के पूरे समीकरण को नहीं समझा जा सकता। इसमें एक बड़ा और महत्वपूर्ण आयाम देशों के भीतर की आंतरिक राजनीति और सामाजिक प्रतिक्रिया का भी होता है।
अमेरिका के भीतर युद्ध से जुड़े निर्णयों पर सार्वजनिक बहस और राजनीतिक मतभेद सामने आते रहे हैं। कुछ अमेरिकी सीनेटरों ने प्रश्न उठाया है कि क्या अमेरिका दोबारा एक ऐसे संघर्ष में उलझ गया है जिसका अंत स्पष्ट नहीं है। वहां मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर भी बहस जारी है कि युद्ध की आर्थिक और रणनीतिक लागत क्या हो सकती है।
इजरायल के भीतर भी प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की नीतियों को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक असहमति सामने आती रही है। युद्ध की परिस्थितियों में राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न निश्चित रूप से प्रमुख हो जाता है, लेकिन इसके बावजूद राजनीतिक मतभेद समाप्त नहीं होते।
इसके विपरीत ईरान में बड़े पैमाने पर जुलूस और सार्वजनिक प्रदर्शन हुए, जिनमें जवाबी कार्रवाई और प्रतिशोध की मांग प्रमुखता से उठी। यह संकेत देता है कि पूरे देश में व्यापक सामाजिक लामबंदी का वातावरण बन चुका है और बदले की भावना तीव्र रूप से उभर रही है। ईरान पर बाहरी दबाव भी अपेक्षाकृत कम है, जबकि रूस, चीन और उत्तर कोरिया जैसे देशों से राजनीतिक समर्थन मिलने की संभावना अधिक है।
यदि युद्ध लंबा खिंचता है, समुद्री मार्ग बाधित रहते हैं, हथियारों की लागत बढ़ती जाती है और राजनीतिक इच्छाशक्ति थकने लगती है तो रणनीतिक संतुलन धीरे-धीरे बदल भी सकता है। आधुनिक सैन्य सिद्धांत में इसे ‘वॉर ऑफ एट्रिशन’ का प्रभाव कहा जाता है—जहां निर्णायक जीत से अधिक महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि कौन पक्ष अधिक समय तक संसाधन, आर्थिक दबाव और राजनीतिक थकान को झेल सकता है।
इतिहास में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब तकनीकी और सैन्य बढ़त के बावजूद लंबा संघर्ष रणनीतिक दबाव पैदा कर देता है। २००६ के लेबनान युद्ध में इजरायल को व्यापक सैन्य कार्रवाई के बाद भी निर्णायक सफलता नहीं मिली और अंततः उसे संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता वाले युद्धविराम को स्वीकार करना पड़ा। इसी तरह अफगानिस्तान और इराक में लंबे अभियानों ने अमेरिका को यह महसूस कराया कि आधुनिक युद्धों में सैन्य शक्ति के साथ-साथ समय, लागत और अंदरूनी दबाव भी निर्णायक कारक बन जाते हैं।
इसलिए इस संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन अधिक शक्तिशाली है, बल्कि यह है कि कौन अधिक समय तक टिक सकता है और संभव है कि इसी प्रश्न में इस पूरे युद्ध का भविष्य छिपा हुआ हो।

(वरिष्ठ पत्रकार हैं और लगभग तीन दशकों से सार्वजनिक नीति, जनसरोकार‌ एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों पर लिखते रहे हैं। वे लंबे समय तक ‘जनसत्ता’ के संपादकीय विभाग का हिस्सा रहे।)

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