खाड़ी युद्ध के झटके भारत को लगने लगे हैं। ये झटके मामूली नहीं हैं, बल्कि भारत की प्रतिष्ठा और साख को नुकसान पहुंचाने वाले हैं। अमेरिका ने हिंद महासागर में घुसकर एक ईरानी युद्धपोत पर हमला किया। यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमाओं और नियमों का उल्लंघन है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस ईरानी युद्धपोत ‘आइरिस देना’ पर अमेरिका ने हमला किया और उसे डुबोया, वह भारत के विशेष निमंत्रण पर विशाखापत्तनम में एक अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने आया था। इस जहाज की प्रशंसा महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की उपस्थिति में की गई थी। यानी, अमेरिका ने भारत में ‘अतिथि’ बनकर आए युद्धपोत पर हमला करके सौ नौसैनिकों को मार डाला। भारतीय क्षेत्र में भारत से संबंधित युद्धपोत पर हमला करना राष्ट्रपति ट्रंप की तानाशाही है और इस तानाशाही को बर्दाश्त करने वाले प्रधानमंत्री मोदी वैश्विक मंच पर भारत को (‘कमजोर/नपुंसक/ नामर्द’) साबित कर रहे हैं। इतनी बड़ी घटना के बावजूद, देश के प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ‘ठंडे’ बैठे हैं। इस ठंडेपन की जितनी भर्त्सना की जाए उतनी कम है! हमारी सरकार अमेरिका के खिलाफ एक साधारण विरोध भी दर्ज नहीं कर सकी। ईरान का युद्धपोत ‘आइरिस देना’ भारत के निमंत्रण पर हमारे यहां आया था और अमेरिका ने उस पर हमला कर दिया। इसलिए
इस हमले की जिम्मेदारी
प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को लेनी ही चाहिए। भारत की आबादी १४० करोड़ है और प्रधानमंत्री इन लोगों की भावनाओं की परवाह किए बिना राजनीति कर रहे हैं। स्पेन की आबादी बमुश्किल ५ करोड़ है। यह देश नाटो का सदस्य है। स्पेन के प्रधानमंत्री ने संसद में कहा, ‘गाजा में जो हुआ वह नरसंहार है। हम अपनी जमीन को ईरान पर हमले के लिए इस्तेमाल नहीं होने देंगे। क्योंकि अमेरिका और इजरायल दोनों ही युद्ध के नियमों का पालन नहीं करते। इजरायल ने ईरान में लड़कियों के एक स्कूल पर बमबारी की और २०० लड़कियों को मार डाला। यह भयानक क्रूरता का उदाहरण है।’ वहीं हमारे प्रधानमंत्री मोदी ने अभी तक युद्ध के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा है। हमारे प्रधानमंत्री जिनके नाम का डंका विश्व गुरु के तौर पर रात दिन बजाया जा रहा है, उनका इस युद्ध के मामले में मौन रहना सवाल खड़े करता है! उन्हें इतनी बड़ी वैश्विक घटनाओं पर चुप क्यों रहना चाहिए? भारत इस समय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की ‘अध्यक्षता’ स्वीकार कर रहा है। ईरान भी ब्रिक्स का सदस्य है। क्या हमें अपने शिखर सम्मेलन के सदस्य ईरान पर हुए हमलों के बारे में एक साधारण बयान भी जारी नहीं करना चाहिए? क्या हमारा नेतृत्व इतना कमजोर और कायर हो गया है? संकट के समय अपने पुराने दोस्तों से मुंह मोड़ लेने वाले को विश्व गुरु की पदवी शोभा नहीं देती। ऐसे युद्ध में भारत जैसे देश की
भूमिका
या तो तटस्थ रहने की या फिर मध्यस्थ होनी चाहिए थी।
भारतीय नेतृत्व के पास इतनी भी मजबूत छाती होनी चाहिए थी कि अगर ईरान द्वारा मानवीय मूल्यों का उल्लंघन किया जाए तो ईरान को और अगर इजरायल इंसानियत का कत्लेआम कर रहा है तो इजरायल को कड़े शब्दों में चेतावनी दे सके। वह ५६ इंच की छाती अब अदृश्य हो गई है! भारतीय जलक्षेत्र में भारत के युद्ध अभ्यास में शामिल हुए ईरानी युद्धपोत को डुबाना भारतीय संप्रभुता को चुनौती देने के बराबर है। यह न केवल घुसपैठ है, बल्कि अमेरिकी आतंकवाद भी है। भारत हमारा गुलाम बन गया है। अब वह हमारा क्या बिगाड़ेगा? यही अमेरिका की भावना है। यह प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के कमजोर नेतृत्व के कारण है। जब बिहार का नेतृत्व कमजोर हुआ, तो भाजपा ने तुरंत बदलाव की कोशिश की और नीतीश कुमार को सत्ता से हटा दिया; लेकिन नेतृत्व परिवर्तन की असली जरूरत दिल्ली में है। प्रधानमंत्री मोदी जितने लंबे समय तक सत्ता में रहेंगे, वैश्विक मंच पर भारत उतना ही कमजोर और असहाय होता जाएगा। ५६ इंच की छाती आदि अब एक मिथक या किंंवदंती बनकर रह गए हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों पर डंडे उठाने वाले भाजपाई अमेरिका की इस घुसपैठ के बारे में क्या कहेंगे? वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी, भारत एक बड़े संकट में है। इस संकट को दूर करना ही होगा।
