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संपादकीय : ‘कुतरी हुई’ स्वास्थ्य व्यवस्था!

दो हफ्ते पहले पेश किए गए राज्य के बजट में सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बड़ी घोषणाएं कीं। मगर भायंदर की एक रोंगटे खड़े कर देनेवाली घटना ने इन घोषणाओं की पोल ही खोल दी। भायंदर के पंडित भीमसेन जोशी अस्पताल में सुहासिनी माठेकर नामक एक वृद्ध महिला को आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा गया था। लेकिन वहां उनका हाथ चूहे ने कुतर दिया और उसकी वजह से हुए अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उनकी दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु हो गई। अस्पताल का आईसीयू चौथी मंजिल पर है। फिर भी एक चूहा वहां वेंटिलेटर पर मौजूद मरीज का हाथ कुतर देता है, ड्यूटी पर तैनात किसी का भी उस ओर ध्यान नहीं जाता। सुहासिनी के हाथ से खून बहता रहता है, सुबह उन्हें मिलने आए रिश्तेदारों के ध्यान में आने पर भाग-दौड़ होती है, परंतु तब तक देर हो चुकी होती है और अत्यधिक रक्तस्राव से सुहासिनी की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु हो जाती है। यह सब कुछ भयानक है और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की आबरू की धज्जियां उड़ानेवाला है। अस्पताल प्रशासन का इस संदर्भ में स्पष्टीकरण और लीपा-पोती
हास्यास्पद और लज्जास्पद
है। आस-पास कई इमारतों का निर्माण कार्य शुरू है इसलिए वहां के बिलों के चूहे अस्पताल में घुस आए होंगे, ऐसा अजीब तर्क अस्पताल द्वारा दिया गया, जो वहां इलाज करा रहे अन्य मरीजों की जान जोखिम में डालनेवाला है। अस्पताल में चूहों के प्रादुर्भाव को रोकने के लिए पेस्ट कंट्रोल का ठेका दिया गया था, ऐसा खुलासा भी प्रशासन ने किया है। अस्पताल में चूहों के भरमार होने की एक तरह से यह कबूलनामा ही है इसलिए सुहासिनी माठेकर की मृत्यु के लिए अस्पताल को ही जिम्मेदार ठहराना चाहिए और वैसा ही गुनाह दर्ज होना चाहिए। राज्य के सरकारी अस्पतालों में चूहों का, तो सरकार के स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। स्वास्थ्य सुविधाओं से ज्यादा ठेकेदारों और सप्लायर्स के ‘आर्थिक स्वास्थ्य’ की चिंता करना और अपनी भी जेबें गरम करना, यही हुक्मरानों का एकसूत्री कार्यक्रम चल रहा है इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सालों-साल हजारों करोड़ खर्च होने के बावजूद आदिवासी इलाकों में माता-बच्चों की कुपोषण से तो मुंबई के पास भायंदर में वेंटिलेटर पर मौजूद वृद्धा की चूहे द्वारा हाथ कुतरे जाने से मौत हो रही है। केंद्र के सत्ताधारी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में आमूल-चूल
सुधार का दावा
करते रहते हैं, परंतु सकल घरेलू उत्पाद का केवल ढाई फीसदी खर्च सार्वजनिक स्वास्थ्य पर किया जा रहा है। १४० करोड़ के हमारे देश में आज भी कुल अस्पताल ‘बेड्स’ की संख्या बमुश्किल १३-१४ लाख ही है। राज्य के सत्ताधारी भी महाराष्ट्र का ‘स्वास्थ्य’ सुधारने का ढोल पीटते रहते हैं। पंद्रह दिन पहले ही पेश हुए बजट में महाराष्ट्र की जनता को विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं देने की शेखी राज्य सरकार ने बघारी। दरअसल, हालात क्या हैं? अस्पताल में चूहों की भरमार है, वेंटिलेटर पर वृद्ध मरीज महिला का हाथ चूहा कुतर रहा है और कर्मचारी अनदेखी कर रहे हैं और उस लापरवाही से उस वृद्धा की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु हो रही है। क्या इसी की इस मंडली की विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सुविधा कहा जाए? एक तरफ बजट में सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रावधान में करीब पांच हजार करोड़ की कटौती करना और दूसरी तरफ विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सेवा की डींगें हांकना। राज्य का सार्वजनिक स्वास्थ्य ‘वेंटिलेटर’ पर है। सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन से ‘कुतरी हुई’ है। पहले उसे ठीक करें और फिर विश्व स्तर वगैरह की शेखी बघारें!

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