अनगिनत योजनाओं की घोषणा, हजारों करोड़ की निधि और खर्च के बड़े-बड़े आंकड़ों के बाण छोड़ते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वित्त वर्ष २०२६ के लिए महाराष्ट्र सरकार का बजट शुक्रवार को विधानसभा में पेश किया। लगभग ११ बार महाराष्ट्र का बजट पेश करने वाले अजीत पवार के दुर्भाग्यपूर्ण निधन के बाद उनका वित्त विभाग संभालने वाले मुख्यमंत्री ने भी यह बजट अजीत पवार को समर्पित किया। अजीत पवार का स्मारक और उनके नाम पर गतिमान नागरी सेवा पुरस्कार की घोषणा मुख्यमंत्री ने की। अजीतदादा के सख्त वित्तीय अनुशासन का उल्लेख मुख्यमंत्री ने जरूर किया, लेकिन उसकी झलक बजट में दिखाई देती तो अच्छा होता। बजट में एक संतोषजनक बात दिखी, वह है किसानों के लिए की गई कर्जमाफी की घोषणा। चुनाव में दिए गए आश्वासन को पूरा करते हुए मुख्यमंत्री ने पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होलकर के नाम पर कर्जमाफी की योजना घोषित की। हालांकि, यह संपूर्ण कर्जमुक्ति या सातबारा कोरा जैसी कर्जमाफी नहीं है। ३० सितंबर २०२५ को फसल कर्ज बकायेदार किसानों को दो लाख तक कर्जमाफी और ऋण की नियमित अदायगी करने वाले किसानों को ५० हजार रुपए तक प्रोत्साहन भत्ता, ऐसा इस योजना का स्वरूप है। यह घोषणा अच्छी है, लेकिन इस कर्जमाफी को अमल में लाने के दौरान अधिकारी किसानों को पात्रता और अपात्रता के पैमाने पर उलझाए न रखें, इसका
खयाल सरकार को
रखना होगा। इसके अलावा एक हजार से अधिक जनसंख्या वाले गांवों को कंक्रीट की सड़कों से जोड़ना, ३०० करोड़ वृक्ष लगाना, मुंबई में २० लाख झुग्गीवासियों के घरों का पुनर्विकास और १० लाख किफायती घर, ईवी वाहनों के कर में छूट, मुंबई-पुणे में भूमिगत मार्ग का जाल, मेट्रो का विस्तार, नासिक का कुंभमेला सफल बनाने के लिए प्रावधान, ऐसी कुछ घोषणाएं बजट में जरूर हैं। लेकिन अटल सेतु के परिसर में तीसरी मुंबई और वाढवण परिसर में चौथी मुंबई, मुंबई का इस तरह विकेंद्रीकरण करने के पीछे सरकार का क्या उद्देश्य है? सातारा जिले के दरे गांव में निसर्गोपचार केंद्र शुरू करने की घोषणा सीधे बजट में करके सरकार में बैठे नाराज लोगों का अच्छा खयाल मुख्यमंत्री ने रखा है, ऐसा दिखाई देता है। मुख्यमंत्री एक के बाद एक घोषणाएं कर रहे थे, खर्च की राशि की आंकड़ेबाजी दे रहे थे। ‘अनंत हस्ते कमलावराने, देता किती घेशील दो कराने?’ ऐसी एक प्रसिद्ध उक्ति है। परमेश्वर हजारों हाथों से इतना भर-भरकर देता है, लेकिन मनुष्य के पास तो केवल दो ही हाथ हैं, वह ले-लेकर कितना लेगा? लेने वाले मनुष्य के ही हाथ कम पड़ जाते हैं, यह इस उक्ति का अर्थ है। योजना, प्रस्ताव और घोषणाओं की बारिश करने वाले मुख्यमंत्री का अर्थसंकल्पीय भाषण देखकर इस उक्ति के अनुसार, महाराष्ट्र की जनता ही सरकार से लेने के लिए कम पड़ रही है क्या, ऐसे सवाल उठने लगे, इतना भ्रम पैदा करनेवाला यह बजट है। महाराष्ट्र सरकार की तिजोरी में तो खालीपन है, तो इतनी घोषणाओं की बारिश बजट में करते समय इसके लिए लगने वाली निधि राज्य सरकार कहां से लाएगी, ऐसा
प्रश्न पूछने में भी
अब कुछ फायदा नहीं है। क्योंकि बजट में कई घोषणाएं निधि के अभाव में वर्षों वर्ष लंबित रहती हैं और इस ताजे बजट में तो आज-कल की अपेक्षा बुनियादी सुविधाओं के माध्यम से साल २०४७ के स्वप्नों का ही मृगजल अधिक दिखता है। महाराष्ट्र के सिर पर आज की स्थिति में लगभग साढ़े नौ से दस लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। सरकार के लगभग ६४ हजार करोड़ रुपए इस कर्ज के व्याज की भरपाई में जाते हैं। कुल कर्ज और राज्य की जनसंख्या की तुलना की जाए, तो महाराष्ट्र के प्रत्येक नागरिक के सिर पर ८२ हजार रुपए के कर्ज का भार है। दिनों-दिन राज्य आर्थिक गिरावट की ओर जाता दिख रहा है। कर्ज लेकर त्योहार मनाने की आदत के कारण राज्य का वित्तीय अनुशासन बिगड़ गया है। ऐसी परिस्थिति में ढहती हुई अर्थव्यवस्था को आकार देने के मामले में इस बजट ने एक तरह से भ्रमित व निरास ही किया है। ‘इन्वेस्ट महाराष्ट्र’ इस मंच के माध्यम से लाखों रोजगार निर्माण का आश्वासन मुख्यमंत्री ने बजट में दिया है। हालांकि, इस रोजगार निर्माण और नौकरियों का वस्तुनिष्ठ ‘रिपोर्ट कार्ड’ सरकार को देना चाहिए। महाराष्ट्र के विकास को गति देने के लिए प्रगतिशील, शाश्वत, सर्वसमावेशक और सुशासन, ऐसे चार स्तंभ सरकार ने तय किए हैं, ऐसा मुख्यमंत्री ने बजट भाषण में कहा। इसके माध्यम से वर्ष २०४७ तक महाराष्ट्र के विकास की इमारत खड़ी होगी, ऐसा गाजर कहें या स्वप्न मुख्यमंत्री ने दिखाया है। वर्ष २०२६ का कम और २०४७ का ही अधिक होने वाला यह बजट स्वप्नों का ही मृगजल है!
