`मोदी’ सरकार बार-बार दावा करती रही है कि खाड़ी युद्ध का भारत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यह दावा पूरी तरह झूठा साबित हुआ है। दो दिन पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया था कि भले ही विश्व में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव हो रहा है, लेकिन इसका घरेलू मुद्रास्फीति पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है। सबसे पहले तो हमेशा की तरह हमारा रुपया बुरी तरह गिर गया है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया गिरकर ९२.३३ के निचले स्तर पर पहुंच गया और उसी समय भारतीय शेयर बाजार भी धराशायी हो गया। ईरान-इजरायल युद्ध में खाड़ी प्रांतों में तेल कुओं और तेल शोधन कंपनियों पर हमले हुए हैं। कतर, बहरीन और कुवैत की तेल फैक्ट्रियां संकट में हैं। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों का रास्ता रोक दिया है। चीन और रूस को छोड़कर बाकी सभी देशों के तेल टैंकर वहां फंसे हुए हैं। भारत के विश्व गुरु अभी तक अपने जहाज वहां से नहीं निकाल पाए हैं। मोदी इस युद्ध की शुरुआत से ही भारत में हैं। इस दौरान उन्होंने विदेश यात्रा नहीं की इसका श्रेय युद्ध को जाता है। इस युद्ध में भारत की कोई भूमिका नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने मोदी को मूक अभिनय करने की अनुमति दी है। भारतीय सिनेमा मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों की ओर बढ़ा, लेकिन इस मामले में मोदी और उनकी फिल्म कंपनी ने उल्टा किया है। वे `बोलबच्चन’ फिल्मों से मूक फिल्मों की ओर बढ़े और उनके
अभिनय की सराहना
अमेरिका ने की है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेक्ट्री ने कहा, `राष्ट्रपति ट्रंप और हमारे वित्त मंत्री ने भारत को रूस से तेल खरीदने की `इजाजत’ सिर्फ इसलिए दी, क्योंकि वे अच्छे `एक्टर’ हैं। वे ठीक वही करते हैं, जो हम उन्हें करने को कहते हैं।’ व्हाइट हाउस का यह बयान भारत का अपमान और निंदा है। प्रधानमंत्री मोदी एक अभिनेता हैं और अमेरिका के इशारों पर एक्टिंग करते हैं। किसी भी प्रधानमंत्री के चलते देश का इस तरह से अपमान नहीं हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी की छाती ५६ इंच की है, ऐसा वे २०१४ से ही छाती ठोककर कहते आ रहे हैं। इस छाती का पिंजर राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा व्हाइट हाउस संग्रहालय में लटका कर रखा हुआ देखा जा सकता है। इस अपमान और बदनामी के दौर में मोदी तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वे सीधे `हॉलीवुड’ से `टॉलीवुड’ के पर्दे पर आ गए हैं। युद्ध के कारण भारत में स्थिति गंभीर होती जा रही है। घरेलू और व्यावसायिक गैस की कमी महसूस होने लगी है। महाराष्ट्र समेत भारतीय किसानों के उत्पाद `निर्यात’ संकट के कारण प्रभावित हो रहे हैं। दुबई और कुवैत के बंदरगाहों पर भारतीय किसानों का माल सड़ रहा है। ऑटोमोबाइल उद्योग और दवा उद्योग पर संकट के बादल छाए हुए हैं। महाराष्ट्र की बात करें तो
`गैस’ की कमी के कारण
मुंबई जैसे शहर में
चालीस प्रतिशत रेस्तरां बंद हो गए हैं। इससे लोगों के रोजगार पर असर पड़ रहा है। राज्य में फाउंड्री उद्योग को `गैस’ की जरूरत होती है। हजारों फाउंड्री उद्योग बंद हो रहे हैं। सरकार ने गैस की कमी का समाधान खोजने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। आखिर यह समिति क्या करेगी? गैस की कमी से निपटने का रास्ता खोजने के लिए इस तीन सदस्यीय समिति को प्रधानमंत्री मोदी के स्वयं के शोध की मदद लेनी होगी। मोदी ने मौजूदा ऊर्जा और गैस संकट से निकलने का रास्ता खोजने के लिए पहले ही शोध कर लिया है। इससे गैस की कमी नहीं होगी। नालियों में पाइप बिछाकर गैस का उत्पादन किया जा सकेगा और घरों में चूल्हे जलाए जा सकेंगे। मोदी ने भारत में इस नई परियोजना का आविष्कार किया है और इसके चलते वैश्विक र्इंधन संकट से निपटने के लिए `नालियों, सीवरों और प्लास्टिक पाइपों’ का महत्व पृथ्वी पर बढ़ेगा। इसके लिए कई देशों को तेल के कुओं की जगह नालियां और सीवर बनाने होंगे और भारत इस पहल में अग्रणी भूमिका निभाएगा। भारत में पहले से ही तालाब, नालों और यहां तक कि नदियां भी नालियों मैं तब्दील हो चुकी हैं। इसलिए गैस और र्इंधन की कमी नहीं होगी। मुंबई में मीठी नदी के किनारे `गैस’ उत्पादन की सबसे बड़ी परियोजना स्थापित की जा सकती है। मुंबई के मेयर द्वारा प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री फडणवीस को इस `गैस’ उत्पादन परियोजना के उद्घाटन समारोह में आमंत्रित करने पर कोई आपत्ति नहीं है। इसका तात्पर्य यह है कि भले ही खाड़ी युद्ध के कारण विश्व भर में र्इंधन और गैस की कमी हो गई हो, मोदी का शोध भारत को नालियों से गैस उत्पादन का लक्ष्य प्राप्त करने में मदद करेगा। जय नमो! नमो!!
