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संपादकीय :  स्वाभिमानी खामेनेई का बलिदान!

अयातुल्लाह खामेनेई ने दुनिया को अलविदा कह दिया है। अपनी जान बचाने के लिए उन्होंने किसी के सामने घुटने नहीं टेके। देश नहीं छोड़ा। बंकर में नहीं छिपे। किसी दूसरे देश से मदद नहीं मांगी। अपने देश की जनता के साथ विश्वासघात नहीं किया। महाशक्तियों के सामने वे मजबूती से खड़े रहे और ताकतवर शक्तियों से लड़ते हुए अपने प्रिय ईरान देश के लिए उन्होंने बलिदान दे दिया। खामेनेई की यह शहादत दुनिया लंबे समय तक याद रखेगी। खामेनेई की यह शहादत लंबे समय तक इतिहास में याद रखी जाएगी। कुछ लोग पद के कारण नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति के कारण हमेशा याद किए जाते हैं। खामेनेई ऐसे ही प्रखर स्वाभिमानी नेताओं में से एक थे। इजरायल और अमेरिका ने दुनिया में संयुक्त झुंडशाही की मुहिम छेड़ दी है। यह इंसानियत के लिए घातक है। इस मुहिम में भारत का नेतृत्व अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो गया है। अमेरिका और इजरायल अपने फायदे के लिए एक साथ आते हैं और यह घोषणा करते हैं कि किसी दूसरे देश में परमाणु हथियारों का विकास कार्यक्रम चल रहा है और उससे हमें खतरा है। वास्तव में उस देश का तेल, खनिज संपदा और व्यापार के अवसर हड़पने के लिए ही यह पूरा नाटक किया जाता है। अमुक देश में लोगों के अधिकार छीने जा रहे हैं, लोकतंत्र खतरे में है, ऐसा शोर मचाकर अमेरिका सीधे उस देश में हस्तक्षेप करता है और अंत में वहां की सरकार गिरा देता है। वहां के लोगों द्वारा चुने गए राष्ट्रपति की हत्या कर दी जाती है। उन्हें फांसी पर लटका दिया जाता है या वेनेजुएला के राष्ट्रपति की तरह उठाकर अमेरिका की जेल में डाल दिया जाता है। जो लोग इस झुंडशाही का विरोध करते हैं और उसके खिलाफ संघर्ष करते हैं, उन पर जंग थोपकर वहां के ‘सुप्रीम लीडर’ को परिवार सहित मार दिया जाता है। ईरान में भी यही हुआ है। ईरान अपना परमाणु हथियार विकास कार्यक्रम बंद करे, इसके लिए
अमेरिका और इजरायल
का दबाव था। ईरान इसके लिए तैयार भी हो गया था, फिर भी इजरायल के नेता नेतन्याहू की ‘खाज’ के कारण अमेरिका ने ईरान पर हमले किए। क्रूरता और अमानवीयता की हद यह थी कि दक्षिण ईरान के होर्मोजगान प्रांत में लड़कियों के एक स्कूल पर इजरायल ने बम गिराया, जिसमें सौ से अधिक मासूम बच्चों की जान चली गई। इजरायल ने ‘गाजा’ क्षेत्र में भी ऐसे ही बम गिराकर फिलिस्तीनी लोगों का वंश खत्म कर दिया। लाखों लोग बेवजह मारे गए। ‘ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए। इससे पूरी मानवता को खतरा पैदा होगा, ‘ऐसा इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू कहते हैं, लेकिन उनके अपने देश में परमाणु हथियारों के भंडार हैं। चीन, रूस, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान के पास भी परमाणु हथियार हैं। फिर दुनिया की सुरक्षा के नाम पर अमेरिका या इजरायल ने उन पर हमला क्यों नहीं किया? ‘ईरान की सरकार से पैदा हुए खतरे को खत्म कर अमेरिकी जनता की रक्षा करना हमारा उद्देश्य है,’ ऐसा राष्ट्रपति ट्रंप कहते हैं। यह बिल्कुल झूठ और बकवास है। ईरान, इराक, सीरिया और लीबिया जैसे देशों से खतरा है, इस तरह की चौधराहट करने का अधिकार तुम्हें किसने दिया? लीबिया के राष्ट्रपति गद्दाफी को भी इसी झुंड ने मार डाला। सद्दाम के देश में रासायनिक हथियार होने का शोर मचाकर युद्ध किया गया और अंत में सद्दाम को फांसी पर लटका दिया गया। लेकिन वे रासायनिक हथियार अंत तक कहीं नहीं मिले। जो लोग अमेरिका की झुंडशाही के सामने स्वाभिमान से खड़े होते हैं, उन्हीं के बारे में दुनिया और मानवता के लिए खतरा होने का शोर मचाया जाता है। भारत से दुनिया और मानवता को कोई खतरा नहीं होना चाहिए। क्योंकि भारत के शासक राष्ट्रपति ट्रंप के सामने समर्पण कर चुके हैं और इजरायल की हालिया यात्रा में नेतन्याहू ने प्रधानमंत्री मोदी के गले में एक ‘पदक’ डालकर उन्हें वापस भेज दिया। तब से मोदी मौन हो गए हैं और जब अमेरिका तथा इजरायल
भारी नरसंहार
कर रहे हैं, तब विश्वगुरु चुप बैठे हैं। कश्मीर मुद्दे पर ईरान ने भारत का खुलकर साथ दिया। भारत को सबसे सस्ते दाम पर तेल दिया। दोस्ती निभाई। भारत को सम्मान दिया। लेकिन ईरान के संकट के समय हम मजबूती से उसके साथ खड़े नहीं हुए। क्योंकि इजरायल ने भाजपा और मोदी को ईवीएम घोटाले का मंत्र दिया। जनता का समर्थन न होते हुए भी सत्ता में कैसे टिके रहना है यह ‘विज्ञान’ दिया। विरोधियों पर निगरानी रखने वाली पेगासस तकनीक दी। भारत ने रूस सहित अपने कई पारंपरिक मित्र खो दिए, जिनमें ईरान भी शामिल है। ईरान दुनिया के गुंडों के खिलाफ अकेला लड़ता रहा। जिन देशों का अमेरिका से टकराव है- रूस, उत्तर कोरिया और चीन वे भी तटस्थ रहे या केवल खोखली धमकियां देते रहे। लेकिन ८६ वर्ष के बुजुर्ग खामेनी रमजान के महीने में अपने देश के लिए शहीद हो गए। खामेनेई आज जीवित नहीं हैं, लेकिन वे जब तक जीवित रहे, किस तरह साहस और स्वाभिमान के साथ जीते रहे, इसकी चर्चा दुनिया में होती रहेगी। देश का स्वाभिमान गिरवी रखने वाला कोई भी समझौता करने से खामेनेई ने इनकार कर दिया। अपने लोगों और देश के लिए वैâसे लड़ना चाहिए, इसका पाठ दुनिया को देकर इस योद्धा ने बलिदान दे दिया। सच्चा नेता ‘सरेंडर’ नहीं करता, बल्कि युद्ध के समय मजबूती से खड़ा रहता है। एक बच्चे ने खामेनी से पूछा, ‘मैं देश के लिए शहीद होना चाहता हूं।’ खामेनेई का जवाब था, ‘बेटा, पहले पढ़ाई करो। वैज्ञानिक बनो। जीवन जियो। मरने की इतनी जल्दी मत करो। जरूरत पड़ी तो देश के लिए मरने के लिए हम सब हैं।’ खामेनेई ने अपने शब्द सच कर दिखाए। अमेरिका और इजरायल के हमले में वे घिर गए, लेकिन उन्होंने भागने का रास्ता नहीं चुना। उनके निधन के बाद ईरान में ४० दिनों का शोक मनाया जाएगा। भारत ने अपना एक सच्चा मित्र खो दिया है। उसके बदले क्या प्रधानमंत्री मोदी एक घंटे का भी शोक मनाएंगे? या फिर ट्रंप और नेतन्याहू क्या सोचेंगे, इस डर से वे मौन ही रहेंगे?

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