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संपादकीय : गैस की कमी का सच!

अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध ने दुनियाभर के कई देशों का हलक सुखा दिया है। अधिकांश देशों को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी सिलिंडर की आपूर्ति खाड़ी देशों से होती है और ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों के आवागमन पर प्रतिबंध लगाने से इन देशों पर निर्भर कई देशों की हालत खराब हो गई है। एक ओर र्इंधन और एलपीजी सिलिंडरों का भंडार घट रहा है, वहीं दूसरी ओर युद्ध के कारण नई आपूर्ति नगण्य है, जिससे कई देश चिंतित हैं। भारत में खाना पकाने की गैस की कमी के कारण स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। केंद्र सरकार चाहे जितना भी इनकार करे, लेकिन स्थिति वास्तव में गंभीर हो चुकी है। महाराष्ट्र सहित देशभर के कई शहरों में खाना पकाने के लिए व्यावसायिक गैस सिलिंडरों की भारी कमी का असर दिखने लगा है। गैस की कमी के कारण कई छोटे रेस्तरां और भोजनालय बंद हो रहे हैं। इससे शिक्षा और नौकरी के लिए शहरों में गए छात्रों और कामगारों को परेशानी हो रही है। सरकार ने उद्योगों को गैस की आपूर्ति रोक दी है। इसके कारण कई कंपनियां बंद हो चुकी हैं। इसके अलावा अगर गैस का जमा भंडार खत्म हो जाता है तो देशभर में आनेवाले दिनों में हजारों कारखाने के बंद होने का खतरा है। ऐसा होने पर लाखों श्रमिकों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ सकता है। देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में ३० प्रतिशत से अधिक होटल और रेस्तरां पर ताले लग चुके हैं।
अभी शादियों का सीजन
चल रहा है और विवाह के इस मौसम में गैस की कमी के कारण विवाह समारोहों की खान-पान व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। गैस सिलिंडर की कीमत दोगुनी हो जाने के कारण कई वैâटरिंग कंपनियों ने शुभ अवसरों के लिए ऑर्डर लेना बंद कर दिया है। मार्च-अप्रैल पर्यटन का मौसम होता है इसलिए गैस की कमी के कारण पर्यटनस्थलों पर पर्यटकों की आवाजाही कम हो गई है। कोकण के प्रसिद्ध गणपतिपुले मंदिर में भी गैस की कमी का गहरा असर पड़ा है। सिलिंडर न मिलने के कारण गणपतिपुले मंदिर में लड्डू और खिचड़ी का प्रसाद बंद करना पड़ा। हालांकि, सरकार का दावा है कि सब ठीक है और गैस की आपूर्ति सुचारु रूप से चल रही है, लेकिन गैस एजेंसियों के बाहर लगी लंबी कतारें सरकार के खोखले दावों को उजागर करने के लिए काफी हैं। मुंबई-पुणे ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के भोपाल, इंदौर और ग्वालियर शहरों में भी उपभोक्ता अपने घरेलू गैस सिलिंडर भरवाने के लिए गैस एजेंसियों के बाहर घंटों कतारों में खड़े हैं। पुणे में इंजीनियरिंग छात्रों के छात्रावासों में भोजन से रोटी और सब्जी पूरी तरह हटा दी गई है। हॉस्टलों में रह रहे छात्रों के मोबाइल फोन पर मैसेज भेजे गए हैं कि गैस की कमी दूर होने तक उन्हें रोटी की जगह दाल-भात खाना पड़ेगा। महाराष्ट्र की शान पैठन में नाथ षष्ठी यात्रा भी गैस की कमी से बुरी तरह प्रभावित हुई। गैस की कमी के कारण दूर-दूर से पैठन आनेवाले तीर्थ यात्रियों को बीच रास्ते से ही लौटना पड़ा। मुंबई की बड़ी सोसायटियों और आवासीय परिसरों में पाइपलाइन के जरिए प्राकृतिक गैस भले ही पहुंच रही है, लेकिन पश्चिमी उपनगरों में कांदिवली से लेकर पूर्वी उपनगरों में धारावी तक गैस एजेंसियों के बाहर
ग्राहकों की लंबी कतारें
लगी हैं। पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण मुंबई, महाराष्ट्र और देश के अन्य हिस्सों में खाना पकाने की गैस की भारी कमी के बावजूद, केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी के इस बयान पर क्या कहा जा सकता है कि देश में गैस सिलिंडरों का पर्याप्त भंडार है और सब कुछ सामान्य है? हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि देश के करोड़ों परिवारों को खाना पकाने की गैस की कमी का सामना न करना पड़े। देश में र्इंधन की कोई कमी नहीं है, बल्कि एलपीजी उत्पादन में २८ प्रतिशत की वृद्धि हुई है, ऐसा दावा हरदीप पुरी का है। यदि लोकसभा में पुरी द्वारा गैस उत्पादन में वृद्धि की जानकारी सही है तो पेट्रोलियम मंत्री को इसका जवाब देना चाहिए कि देशभर में गैस एजेंसियों के बाहर ग्राहकों की लंबी कतारें क्यों लगी हैं और देशभर के छोटे-बड़े रेस्तरां और भोजनालय क्यों बंद हो रहे हैं? यदि एलपीजी का भंडार पर्याप्त है तो सरकार ने सिलिंडर बुकिंग की अवधि क्यों बढ़ा दी? शहरों में २१ दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में २५ दिन के बजाय ४५ दिन के बाद ही गैस बुक करने का नियम क्यों बनाया गया? एक ओर सरकार कहती है कि गैस सिलिंडरों का भंडार पर्याप्त है। गैस उत्पादन बढ़ा है, ऐसा दावा सरकार करती है और दूसरी ओर, वह गैस बुकिंग की अवधि बढ़ा रही है। यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है? सरकार के बड़े-बड़े दावों के बजाय, गैस एजेंसियों के बाहर लगी लंबी कतारों और गैस स्टेशनों के बंद होने से ही गैस की कमी की सच्चाई सामने आ रही है। आखिर सरकार किसे धोखा दे रही है?

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