महाराष्ट्र के नववर्ष के रूप में आज गुढी पाडवा का मंगलमय तोरण सज्जित करना चाहिए। विजय, वैभव और वसंत ऋतु का स्वागत करने का आज का दिन प्रेरणादायी, आनंदमयी होना चाहिए, यही अपेक्षा सामान्य जन रखते हैं। हमारे महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता की, स्वाभिमान की, न्यायोचित अधिकारों की गुढी सजाने का अधिकार हमें ब्रह्मदेव ने ही दिया। आज का दिन यानी ब्रह्मदेव द्वारा विश्व की निर्मिती किए जाने की याद के रूप में मनाया जाता है। विश्व ब्रह्मदेव ने निर्माण किया, लेकिन महाराष्ट्र का निर्माण छत्रपति शिवाजी महाराज ने किया। हिंदवी स्वराज्य की गुढी हमारे राजा ने खड़ी की, सजाई। आगे उन्हीं के विचारों से महाराष्ट्र में विजय के, संघर्ष के असंख्य गुढियां-तोरण फहराकर छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम कायम रखा गया। मराठी मानुष हमेशा भारत का संरक्षक और आधार बनकर रहा। आज के गुढी पाडवा की विशेषता यह है कि हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे का वर्तमान में जन्मशताब्दी वर्ष शुरू है। मराठी मानुष को महाराष्ट्र में स्वाभिमान से जीना ही चाहिए, इस विचार की जो गुढीr खड़ी की वह शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने की।
अगर सिवाजी न होते
तो सुन्नत सबकी होती
कासी की कला जाती
मथुरा की मस्जिद होती
ऐसा कवि भूषण ने छत्रपति के शौर्य के बारे में लिख रखा है। वही आगे शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब के बारे में कहा जा सकता है। शिवसेनाप्रमुख न होते तो अयोध्या पर विजय पताका आज के `ऐरे-गैरों’ सत्ताधारियों को फहराना संभव होता क्या? हिंदुओं में जो लड़ने का, त्याग का और एकत्र आने का
चैतन्य बालासाहेब ने निर्माण किया
क्या वह किसी से संभव हुआ होता? मराठी मानुष के नाते उसका मुंबई, महाराष्ट्र पर पहला अधिकार रहेगा ही रहेगा, ऐसा डंके की चोट पर कहने की हिम्मत एक भी महाराष्ट्रीय नेता में थी क्या? मराठी मानुष के सीने में यह आत्मविश्वास की ताकत देने का काम बालासाहेब ने नहीं किया होता, तो आज का पैर जमाकर खड़ा मराठी मानुष नहीं दिखता। गुढी पाडवा के निमित्त इन सभी बातों का स्मरण करना ही चाहिए। विश्व ब्रह्मदेव का, लेकिन मुंबई सहित महाराष्ट्र मराठी मानुष ने लड़कर, झगड़कर प्राप्त किया, इसलिए उस पर विजय पताका मराठी जनों की ही फहरानी चाहिए, यह निश्चित है। प्रत्येक गुढी पाडवा एक नई आशा का संदेश देता है। यह वही दिन है जिस दिन राजा शालिवाहन ने शत्रु पर विजय प्राप्त की थी। भले ही शत्रु पर विजय प्राप्त करना कई बार कठिन लगता हो फिर भी अथक संघर्ष के बाद विजय की पताका फहरती ही है। देश में और महाराष्ट्र में भी वर्तमान में जो विजय की गर्जनाएं करके `पाडवा’ मनाने का उत्साह दिख रहा है, वह एक तरह से सत्ता और पैसे का अहंकार है। दूसरे दलों के जीतकर आए हुए लोग सीधे खरीद लेना और अपने-अपने विजय की पताका फहराना, विजय की गुढियां खड़ी करना, ऐसे दरिद्र काम वर्तमान में हमारे महाराष्ट्र और देशभर में निर्बाध चल रहे हैं। इन जैसे लोगों के हाथ में न देश सुरक्षित है, न हिंदू धर्म। विश्व में युद्ध के कारण अशांति, भय निर्माण हुआ है। युद्ध दो-चार देशों में शुरू है, लेकिन भारत नाम का स्वघोषित विश्वगुरु कोई भी भूमिका लेने को तैयार नहीं है। अमेरिका और इजरायल जैसे साहूकारी राष्ट्रों के गुलाम के रूप में जीना भारत जैसे महान देश के नसीब में अब आया है। भारतीय जनता का ऐसा जो नसीब फूटा है वह उनके द्वारा
अंधभक्त बनकर
किए गए मतदान के कारण। `गैस का सिलेंडर पांच हजार रुपए में खरीदेंगे, लेकिन हमें मोदी और गोदी ही चाहिए,’ यह धर्मांध भांग की गोली संपूर्ण समाज को अनियंत्रित कर रही है। गुढी पाडवा के दिन भी लोग `गैस’ की कतार में ही हैं, लेकिन कहीं आक्रोश नहीं या चिढ़ नहीं। वो आवाज उठाती थी शिवसेना जैसी ज्वलंत विचारों वाली पार्टी। वह ज्वलंत विचारों वाला दल भी पैसों के दम पर तोड़ा गया और महाराष्ट्र को स्वाभिमान-शून्य बनाने की अघोरी इच्छा कुछ लोगों ने पूरी की। इंसान को स्वच्छ हवा नहीं, स्वच्छ पानी नहीं, युवकों को नौकरी नहीं, किसानों के माल को उचित दाम नहीं, किसान इतना विवश हो गया है कि वह अपनी किडनी बेचकर साहूकारों का कर्ज चुका रहा है और यह सब हमारे महाराष्ट्र में घट रहा है। छत्रपति शिवराय ने जहां सोने के हल से खेती करके श्रमजीवियों को आधार दिया, उस महाराष्ट्र में मेहनतकशों की ही विजय पताका कभी फहराती थी, लेकिन वह अब इतिहास की बात हो गई। शिवराय का महाराष्ट्र अब अडानी-छाप उद्योगपतियों का हो रहा है। मेहनतकशों की मुंबई मुट्ठीभर धनिकों के जेब में जा रही है और यह मुंबई काले कारनामों से जीतने का रावणी आनंद मनाने वाले ही हमारे सामने महाराष्ट्र के शत्रु बनकर खड़े हैं। आज का `पाडवा’ इस शत्रु को गाड़कर महाराष्ट्र पर विजय की गुढीr खड़ी करने का निश्चय करने का है। हम सब एक हैं। हमारे भीतर आत्मविश्वास है। उसी आत्मविश्वास के बल पर महाराष्ट्र के आसमान पर पैâले काले बादल दूर करके नया भगवा आकाश निर्माण करने का निश्चय आज करें। ये दिन भी बीत जाएंगे, इस विश्वास को सार्थक सिद्ध करके ही आज की गुढी खड़ी करें, गुढी सजाएं!
