राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जब पश्चिम बंगाल के दौरे पर थीं, तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उनका स्वागत करने नहीं गर्र्इं। प्रधानमंत्री मोदी ने यह प्रचार शुरू कर दिया है कि यह भारत के राष्ट्रपति का अपमान है। अगर भाजपा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में राष्ट्रपति के अपमान को चुनावी मुद्दा बना रही है, तो ममता बनर्जी की शानदार जीत निश्चित है। चूंकि भाजपा के पास जनहित के अन्य कोई मुद्दे नहीं हैं, इसलिए राष्ट्रपति के अपमान को राजनीतिक मुद्दा बनाना घृणित है। भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल नहीं जीत सकती और न ही भविष्य में जीत पाएगी, इसलिए राष्ट्रपति पद पर विराजमान आदिवासी महिला को राजनीतिक मैदान में उतारना उचित नहीं है। ममता बनर्जी का दिया गया स्पष्टीकरण समझ जाना चाहिए।’ `राष्ट्रपति की यात्रा सरकार को विश्वास में लिए बिना तय की गई थी। जब हम यहां आंदोलन और धरने में उलझे हुए थे, तब राष्ट्रपति कोलकाता हवाई अड्डे पर पहुंचीं। हमने शहर के मेयर को उनके स्वागत के लिए भेजा। हम और क्या कर सकते थे? अगर राष्ट्रपति पचास बार यहां आएंगी, तो क्या हमें हर दिन उनका स्वागत करने जाना चाहिए?’ ममता बनर्जी का गुस्सा समझा जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच राष्ट्रपति की बार-बार यात्राएं उचित नहीं है। राष्ट्रपति का पश्चिम बंगाल में अपमान हो और उस पर राजनीति की जा सके, क्या इसी उद्देश्य के चलते राष्ट्रपति को पश्चिम बंगाल के दौरे पर भेजा जा रहा है? जब भाजपा ने कहा कि राष्ट्रपति का अपमान करना एक आदिवासी महिला का अपमान है, तो ममता बनर्जी ने पलटकर अच्छी तरह से धुनाई कर दी। मणिपुर में आदिवासी महिलाओं को निर्वस्त्र किए जाने पर राष्ट्रपति चुप क्यों रहीं? कई आदिवासी राज्यों में, जंगलों में रहने वाले
आदिवासियों के अधिकारों
को जब रौंदा गया, तब राष्ट्रपति चुप क्यों रहीं? उद्योगपतियों ने आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को निगल लिया है, बावजूद इसके राष्ट्रपति खुली आंखों से इन अत्याचारों को क्यों सहन कर रही हैं? ममता बनर्जी के हमलों ने भाजपा की बोलती बंद कर दी, लेकिन मोदी ने द्रौपदी अपमान का अपना राग अलापना बंद नहीं किया है। इससे पहले, जब द्रौपदी मुर्मू हरियाणा में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल हुर्इं, तो उस राज्य के भाजपा मुख्यमंत्री कम से कम दो बार अनुपस्थित रहे। तब भी आदिवासी महिला राष्ट्रपति का अपमान हुआ था, लेकिन लगता नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी को इस पर कोई धक्का लगा। जब मोदी ने २८ मई, २०२३ को दिल्ली में नए संसद भवन का उद्घाटन किया, तब राष्ट्रपति मुर्मू को आमंत्रित नहीं किया गया। यह न केवल संसदीय परंपरा और राजशिष्टाचार के विरुद्ध था, बल्कि अपमानजनक भी था। मोदी सरकार ने अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर के उद्घाटन समारोह में भी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को आमंत्रित करने का शिष्टाचार नहीं दिखाया। जनता इसे भूली नहीं है। अब यही मोदी आदिवासी महिला राष्ट्रपति का अपमान करने के लिए ममता बनर्जी पर हमला बोल रहे हैं, हो-हल्ला मचा रहे हैं। प्रधानमंत्री का यह कहना कि राष्ट्रपति का अपमान करना देश का अपमान है, यह उचित नहीं है। सच तो ये है कि उनके शासनकाल में देश में नैतिकता, राष्ट्रीय हित और स्वाभिमान खत्म हो चुका है। `एपस्टीन फाइल’ नामक यौन शोषण मामले में भारत के कई बड़े नामों का खुलासा हुआ है और ये सभी लोग मोदी के सहयोगी हैं। लगता नहीं कि मोदी को इस बात पर कोई खेद है और न ही कोई पछतावा। मध्य-पूर्व में चल रहे युद्ध पर मोदी ने अभी तक एक शब्द भी नहीं कहा है। ऐसा लगता है मानो विश्व मामलों में भारत का अस्तित्व ही समाप्त हो गया हो। यह स्थिति भारत के लिए अपमानजनक है। भारत ने अमेरिका के साथ जो व्यापार समझौता किया है, वह एक तरह से
अमेरिका की गुलामी
है। जब भारत को गुलाम बनाने का समझौता चल रहा था, तब हमारे राष्ट्रपति का आत्मसम्मान और देशभक्ति नहीं जागे। उन्हें प्रधानमंत्री मोदी को ऐसा स्वाभिमान शून्य समझौता करने से रोकना चाहिए था। उस समय न तो राष्ट्रपति और न ही प्रधानमंत्री को लगा कि देश का अपमान हुआ है, लेकिन पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति महोदय के स्वागत में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नहीं पहुंचीं। इस बात का दुख प्रधानमंत्री को रुला रहा है। राष्ट्रपति को राज्य के चुनावी मैदान में घसीटना वास्तव में राष्ट्रपति का अपमान है। भारतीय जनता पार्टी के अपने कोई विचार नहीं हैं। वह उस समय जो भी मुद्दा मिलता है, उसे उठाती है और चुनाव समाप्त होने तक उस पर स्यापा मचाती रहती है। मोदी के अमृत काल में राष्ट्रपति भवन की गरिमा फीकी पड़ गई है। शिल्पकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा राष्ट्रपति भवन से हटाकर उसकी जगह सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित की गई। इससे न तो इसकी प्रतिष्ठा बढ़ी और न ही गुलामी की बेड़ियां टूटीं। पहले राष्ट्रपति को `रबर स्टैंप’ कहा जाता था, लेकिन इन रबर स्टैंपों की अपनी प्रतिष्ठा और गौरव था। यदि डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर डॉ. अब्दुल कलाम और प्रणव मुखर्जी तक राष्ट्रपतियों को देखें, तो पता चलेगा कि राष्ट्रपति भवन में कितने शक्तिशाली लोग निवास करते थे। अनुभव, विशेषज्ञता, नेतृत्व क्षमता और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान के मामले में अग्रणी रहे लोगों को राष्ट्रपति पद पर नियुक्त किया गया, लेकिन मोदी युग में ऐसे असाधारण व्यक्तियों की कमी के कारण, सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर सभी प्रमुख कठपुतलियों और गुमनाम लोगों को बिठा दिया गया। इसे भी उन सर्वोच्च पदों और जनभावना का अपमान कहा जा सकता है, लेकिन क्या वह व्यक्ति जो राष्ट्रपति ट्रंप जैसे लोगों द्वारा अपमानित किए जाने के बावजूद अपने चेहरे पर विकट मुस्कान रखता है, राष्ट्रपति के अपमान के बारे में कुछ कह सकता है? ममता बनर्जी पहले ही इस पर कठोर टिप्पणी कर चुकी हैं। यह सही है।
