धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई
हाफ वे होम में फंडिंग संकट लगातार गहराता जा रहा है। अनुदान अटकने से इलाज भी लटक गया है और इसका सीधा फटका अब मरीजों को झेलना पड़ रहा है। राज्य के करीब १,५०० मानसिक रोगियों के पुनर्वास की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, वहीं समय पर दवाइयां न मिलने से दोबारा बीमारी बढ़ने का खतरा भी मंडरा रहा है। व्यवस्था की इस लापरवाही ने न सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि मरीजों के भविष्य को भी अनिश्चित बना दिया है। इस गंभीर मुद्दे को लेकर विधानसभा में दिए गए लिखित जवाब में सरकार घिरती नजर आई, जहां जवाब देते हुए स्थिति को आंशिक रूप से सही मानना पड़ा।
राज्य में मानसिक रोगमुक्त लोगों के पुनर्वास के लिए शुरू की गई हाफ वे होम योजना अब फंडिंग संकट के कारण सवालों के घेरे में है। पुणे, ठाणे, नागपुर और रत्नागिरी में प्रस्तावित १६ पुनर्वास केंद्रों के जरिए मरीजों को आत्मनिर्भर बनाने का दावा किया गया था। लेकिन हकीकत में अब तक केवल ८ केंद्र ही शुरू हो पाए हैं। इस मुद्दे को लेकर विधानसभा में लिखित तारांकित प्रश्नों के जरिए सरकार को घेरते हुए सदस्य ने गंभीर आरोप लगाए। सदस्य शंकर जगताप ने सवाल उठाया कि इन केंद्रों में रह रहे करीब १,५०० मानसिक रोगियों के इलाज और पुनर्वास पर अनुदान में देरी का सीधा असर पड़ रहा है। मरीजों को निवास, प्रशिक्षण, दवाइयों और सामाजिक पुनर्वास के लिए प्रति व्यक्ति ५,५०० से १५,००० रुपए तक अनुदान तय है, जबकि कुछ योजनाओं में १२,००० रुपए मासिक सहायता का भी प्रावधान है। इसके बावजूद पिछले दो वर्षों से दवाइयों के लिए नियमित् ा फंड उपलब्ध नहीं होने की शिकायतें सामने आई हैं। स्थिति यह है कि समय पर दवाइयां नहीं मिलने से मरीजों में दोबारा मानसिक बीमारी बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। हाफ वे होम संचालकों ने भी आशंका जताई है कि य्ादि फंडिंग की समस्या जल्द नहीं सुलझी, तो पुनर्वास की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
