गजल

नहीं जोर मेरा कोई जिंदगी पर
तरस आ रहा है मेरी बेबसी पर
तेरी दिलफरेबी लुभाती है मुझको
नजर टिक गई है तेरी सादगी पर
बरसती रहें रहमतें हर घड़ी यूं
कभी तो करम हो मेरी तिश्नगी पर
अजब सी कशिश है तेरी रोशनी में
फिसलते कदम हैं अब तीरगी पर
किसी की दुआ का असर है ये शायद
सुकूं-सा उतरता है अब जिंदगी पर
नशा तो तेरी ही नजर का हुआ है
न इल्जाम देना मेरी मयकशी पर
“कनक” आज भी नाज करती हूं खुद पे
है कायम मेरा नाज इस आशिकी पर।
-डॉ. कनक लता तिवारी

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