कर्ज के पहाड़ पर खड़ा ‘नया भारत’: क्या विकास की चमक के पीछे छिप रहा है भारत का कर्ज साम्राज्य?
अनिल मिश्र / रांची
2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता संभाली, तब देश के सामने एक नया राजनीतिक नारा रखा गया—“नया भारत”, “अच्छे दिन” और “मजबूत अर्थव्यवस्था”। उस समय बार-बार कहा गया कि पिछली सरकार, जिसे मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस गठबंधन चला रहा था, उसने देश को आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया है। लेकिन लगभग एक दशक बाद आज देश के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा है—क्या भारत वास्तव में आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है या देश तेजी से कर्ज के पहाड़ पर चढ़ता जा रहा है? सरकारी बजट और आर्थिक रिपोर्टों के आंकड़े बताते हैं कि भारत का कुल सार्वजनिक कर्ज लगातार बढ़ रहा है। यह लेख इसी बढ़ते कर्ज की पड़ताल करता है—आंकड़ों, विश्लेषण और राजनीतिक सवालों के साथ।
बढ़ता सरकारी कर्ज
2004 के आसपास भारत का कुल सरकारी कर्ज लगभग 17 लाख करोड़ रुपये था। 2014 तक यह बढ़कर करीब 55 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह वृद्धि जरूर हुई, लेकिन उसी समय भारत की जीडीपी भी तेजी से बढ़ रही थी। कई वर्षों तक भारत की विकास दर 7 से 8 प्रतिशत के बीच रही।
जब सरकारी कर्ज बढ़ता है तो उसका बोझ अंततः नागरिकों पर ही आता है। 2014 के आसपास प्रति भारतीय नागरिक पर कर्ज लगभग 40 से 45 हजार रुपये था। आज भाजपा सरकार के कार्यकाल में प्रति नागरिक कर्ज एक लाख रुपये से अधिक हो चुका है, जो देश की जनता के लिए चिंता का विषय है। इसका अर्थ यह है कि एक नवजात बच्चा भी जन्म लेते ही सरकारी कर्ज का बोझ लेकर आता है।
कांग्रेस काल की प्रमुख योजनाएं
कांग्रेस सरकार के समय कर्ज लेकर कई सामाजिक और आर्थिक योजनाएं लागू की गईं, जिनका उद्देश्य देश और जनता का हित था। इनमें ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, शिक्षा का अधिकार, ग्रामीण सड़क योजना, ग्रामीण विकास योजनाएं, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, बैंकिंग विस्तार, सूचना का अधिकार और खाद्य सुरक्षा का अधिकार जैसे कार्यक्रम शामिल थे। इन योजनाओं ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और गरीब वर्गों की क्रय शक्ति को बढ़ाने में भूमिका निभाई।
मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल
मोदी सरकार के कार्यकाल में कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जैसे डिजिटल भुगतान, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टार्टअप इकोसिस्टम। लेकिन कई फैसले, जैसे नोटबंदी और कृषि कानून, गंभीर विवाद और आर्थिक बहस का कारण बने। भारत जैसे विशाल देश में आर्थिक नीतियों का प्रभाव जटिल होता है, इसलिए इन नीतियों का निरंतर मूल्यांकन जरूरी है।
कर्ज में तेज वृद्धि
2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। सरकार ने कई बड़े आर्थिक कदम उठाए, जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और बड़े रक्षा सौदे। लेकिन इन सबके बीच सरकारी कर्ज भी लगातार बढ़ता गया। आंकड़ों के अनुसार 2014 में कुल कर्ज लगभग 55 लाख करोड़ रुपये था। 2020 के आसपास यह लगभग 105 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया और हाल के वर्षों में यह 150 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। यानी एक दशक में कर्ज लगभग तीन गुना हो गया।
कर्ज और जीडीपी का अनुपात
किसी देश की आर्थिक स्थिति को समझने के लिए केवल कुल कर्ज देखना पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए डेब्ट टू जीडीपी रेश्यो देखा जाता है। 2014 के आसपास भारत का यह अनुपात लगभग 66 प्रतिशत था, जो हाल के वर्षों में बढ़कर करीब 80 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसका अर्थ है कि देश की अर्थव्यवस्था की तुलना में कर्ज तेजी से बढ़ रहा है।
हर नागरिक पर बढ़ता बोझ
सरकारी कर्ज का बोझ अंततः नागरिकों पर ही आता है। 2014 में प्रति व्यक्ति कर्ज लगभग 40 से 45 हजार रुपये था, जबकि आज यह एक लाख रुपये से अधिक हो चुका है। इसका मतलब है कि देश का हर नागरिक सरकारी कर्ज का हिस्सा वहन कर रहा है।
बजट में ब्याज भुगतान का बढ़ता बोझ
भारत सरकार के बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च हो जाता है। हर साल लाखों करोड़ रुपये पुराने कर्ज के ब्याज में चले जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार योजनाओं के लिए कम संसाधन बचते हैं।
सरकार का तर्क
सरकार का कहना है कि यह कर्ज विकास परियोजनाओं में लगाया जा रहा है, जैसे राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे विस्तार, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और रक्षा आधुनिकीकरण। सरकार का तर्क है कि यह निवेश भविष्य में आर्थिक वृद्धि को तेज करेगा।
आलोचना और बहस
आलोचकों का आरोप है कि कई बार कर्ज का उपयोग चुनावी राजनीति के लिए भी किया जाता है, जैसे मुफ्त योजनाएं या अल्पकालिक घोषणाएं। यदि कर्ज से स्थायी उत्पादन और रोजगार नहीं बढ़ता, तो वह भविष्य के लिए बोझ बन सकता है।
युवाओं की सबसे बड़ी चिंता: रोजगार
भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है। मोदी सरकार ने सत्ता में आने से पहले हर वर्ष दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा किया था। लेकिन आज भी बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। लाखों युवा सरकारी नौकरियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और कई छोटे उद्योग बंद हो रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण
दुनिया के कई देश अत्यधिक कर्ज के कारण आर्थिक संकट का सामना कर चुके हैं। ग्रीस, अर्जेंटीना और श्रीलंका इसके उदाहरण हैं। हालांकि भारत अभी उस स्थिति में नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कर्ज की गति पर नियंत्रण जरूरी है।
आर्थिक स्वतंत्रता पर सवाल
आर्थिक इतिहास बताता है कि अत्यधिक कर्ज कई देशों की आर्थिक स्वतंत्रता को कमजोर कर सकता है। जब सरकार की आय का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में लगने लगे, तो नीतियों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
नागरिकों की भूमिका
लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है। इसलिए नागरिकों को यह सवाल पूछना चाहिए कि कर्ज क्यों बढ़ रहा है, कर्ज का पैसा कहां खर्च हो रहा है और इससे रोजगार कितना पैदा हो रहा है।
भारत के सामने रास्ता
भारत के पास अभी भी मजबूत संभावनाएं हैं। इसके लिए जरूरी है कि विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार किया जाए, रोजगार सृजन पर जोर दिया जाए, राजकोषीय अनुशासन लागू किया जाए और शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि तथा अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाया जाए।
भारत आज एक महत्वपूर्ण आर्थिक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर विकास के बड़े दावे हैं और दूसरी ओर तेजी से बढ़ता सरकारी कर्ज। इसलिए जरूरी है कि आर्थिक नीतियों पर खुली बहस हो और सरकार पारदर्शिता के साथ बताए कि कर्ज का पैसा कहां खर्च हो रहा है।
क्योंकि आखिरकार सरकारी कर्ज केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है। अगर कर्ज विकास में बदलता है तो वह निवेश है, लेकिन अगर कर्ज केवल राजनीतिक लोकप्रियता के लिए लिया जाता है तो वह भविष्य के लिए खतरा बन सकता है। इसलिए आज सबसे जरूरी है कि भारत के नागरिक आर्थिक मुद्दों पर जागरूक हों और देश के भविष्य को ध्यान में रखते हुए सवाल पूछें।
