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कागज पर विकास, हकीकत में घाटा! – आर्थिक सर्वेक्षण ने उजागर की महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था की दूसरी सच्चाई


राजन पारकर

महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रकाशित “महाराष्ट्र आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26” रिपोर्ट में राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत, गतिशील और तेजी से बढ़ती हुई बताया गया है। हालांकि उसी रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े सरकार की आर्थिक नीतियों पर कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। कागज पर विकास का ढोल पीटा जा रहा है, लेकिन वास्तविकता में राज्य की आर्थिक संरचना असंतुलित, कर्ज के बोझ से दबाव में और कृषि संकट से घिरी हुई दिखाई देती है।

विकास के दावे, लेकिन अर्थव्यवस्था का असंतुलित ढांचा
सरकार की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025–26 में राज्य की आर्थिक वृद्धि दर 7.9 प्रतिशत रहने की संभावना है। लेकिन इस वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान सेवा क्षेत्र का है, जिसकी वृद्धि दर 9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। वहीं उद्योग क्षेत्र की वृद्धि दर 5.7 प्रतिशत और कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर केवल 3.4 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई है। इससे स्पष्ट होता है कि राज्य की अर्थव्यवस्था की नींव माने जाने वाले कृषि क्षेत्र को अभी भी पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल रही है।

खेती में उत्पादन बढ़त और गिरावट का विरोधाभास

रिपोर्ट के अनुसार खरीफ मौसम में अनाज, गन्ना और कपास के उत्पादन में वृद्धि होने की संभावना है। लेकिन दलहन और तिलहन के उत्पादन में क्रमशः 28.2 प्रतिशत और 47.4 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान व्यक्त किया गया है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति राज्य की खाद्य सुरक्षा के लिए चिंताजनक हो सकती है।

मत्स्य और दुग्ध क्षेत्र में गिरावट
आर्थिक रिपोर्ट में एक और चिंताजनक तथ्य सामने आया है। समुद्री मत्स्य उत्पादन 4.63 लाख मीट्रिक टन से घटकर 2.93 लाख मीट्रिक टन रह गया है। मीठे पानी में मत्स्य उत्पादन 2.69 लाख टन से घटकर 1.47 लाख टन हो गया है।सहकारी दुग्ध संस्थाओं द्वारा दूध संग्रहण में भी कमी दर्ज की गई है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमजोर स्थिति साफ दिखाई देती है।

आय बढ़ रही है, लेकिन खर्च उससे अधिक
राज्य की आय वर्ष 2025–26 में लगभग 5.60 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जबकि राजस्व व्यय 6.06 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है। अर्थात सरकार की तिजोरी में आने वाले धन से अधिक खर्च हो रहा है।

राज्य की अर्थव्यवस्था पर कर्ज का दबाव
रिपोर्ट के अनुसार राज्य का कुल ऋणभार सकल राज्य घरेलू उत्पाद का लगभग 18.3 प्रतिशत है। सरकार ने पिछले दशक में कर्ज को नियंत्रित रखने का दावा किया है, लेकिन बढ़ते खर्च और पूंजीगत निवेश के कारण आने वाले समय में कर्ज का बोझ बढ़ने की आशंका विशेषज्ञों ने व्यक्त की है।

राशन कार्ड और गरीबी की वास्तविकता
राज्य में लगभग 2.70 करोड़ राशन कार्ड धारक हैं और 51,636 उचित मूल्य की दुकानें संचालित हो रही हैं। यह आंकड़ा इस बात का संकेत देता है कि राज्य की बड़ी आबादी आज भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर निर्भर है।

कागज पर उद्योग, जमीन पर बेरोजगारी
सरकार ने औद्योगिक नीति, निवेश और रोजगार सृजन को लेकर बड़े दावे किए हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति में बेरोजगारी की समस्या अब भी गंभीर बनी हुई है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों का पंजीकरण बढ़ा है, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता और स्थिरता को लेकर रिपोर्ट में स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है।

समग्र तस्वीर – “विकास” या सिर्फ “दावा”?
महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने के बावजूद आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि विकास का लाभ सभी क्षेत्रों तक समान रूप से नहीं पहुंचा है। कृषि क्षेत्र की धीमी वृद्धि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गिरावट, बढ़ता सरकारी खर्च और कर्ज का बोझ – ये सभी तथ्य सरकार के विकास के दावों पर सवाल खड़े करते हैं। सरकार की इस रिपोर्ट ने एक बात स्पष्ट कर दी है – विकास की घोषणाओं से अलग वास्तविक आर्थिक स्थिति कहीं अधिक जटिल है।

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