मुख्यपृष्ठधर्म विशेषहोली और पौराणिक संदर्भ

होली और पौराणिक संदर्भ

शीतल अवस्थी

प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु का विरोधी था। वह खुद को देवताओं से भी ज्यादा शक्तिशाली मानता था। उसकी मंशा थी कि जनमानस में सिर्फ उसी की पूजा की जाए। उसे अपने पुत्र प्रह्लाद से ही चुनौती मिल गई थी कि संसार में हिरण्य यानी स्वर्ण धातु ही सब कुछ नहीं होता। अत: प्रह्लाद ने विष्णुजी के नाम जप, स्मरण और कर्तव्यनिष्ठा का जागरण शुरू कर दिया था। द्वापर युग में भी फाल्गुन की पूर्णिमा को श्रीकृष्ण ने पूतना का वध किया था। इसलिए पूतना यानी ढुंढा राक्षसी को जलाने के लिए मालवा, राजस्थान, पंजाब आदि क्षेत्रों में गोबर से बनी मालाएं आदि होलिका में जलाने का भी प्रचलन है। हिरण्यकश्यप की बढ़ती आसुरी प्रवृत्ति को देखते हुए विष्णुजी ने नरसिंह अवतार लिया। हिरण्यकश्यप को वरदान मिला था कि वह दिन में, रात में, घर में, घर के बाहर, आकाश में, धरती पर और इंसान या जानवर के मारने से नहीं मरेगा। वरदान के चलते नरसिंह भगवान ने घर की देहरी पर उसे अपनी गोद में लेकर उसका वध कर प्रह्लाद को उनका अधिकार दिलाया। इसी वंश में प्रह्लाद के पौत्र राजा बलि ने वामन अवतार से लेकर असुरों की प्रसुप्त, सद्भभावना को जगाया व तीनों लोकों पर आधिपत्य कर रहे, साम्राज्य से मुक्त कराकर वैभव संपदा को जनहित में वितरण करने में सफलता पाई।

अन्य समाचार