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पाठकों की होली कविताएं

भाषा प्रांत धर्म का टंटा।
चलो जलाएं होली में।।
जहां प्रेम है, वहीं पहुंच कर।
हाथ मिलाएं होली में।।
करें होलिका दहन आज हम।
नाचें कूदें होली में।।
सब रंगों को साथ मिलाकर।
खुशी मनाएं होली में।।
अपनों को हम गले लगाएं।
मिलकर गाएं होली में।।
गुजराती धरती पर आकर।
होली गाएं होली में।।
मायूसी को दूर भगाएं।
भंग जमाएं होली में।।
गदरीले पूरे मौसम में।
कमर हिलाएं होली में।।
प्यार जहां भी छुपा हुआ हो।
बाहर लाएं होली में।।
नफरत को हम मार भगाएं।
अब की प्यारी होली में।।
भाभी को भी पास बुलाकर।
रंग लगाएं होली में ।।
छूट मिली है आज हमें तो।
चलो नाहाएं होली में ।।
घुस घुसकर सबके घर में हम।
धूम मचाएं होली में ।।
देश हमारा डूब रहा है।
देख रहा हूं होली में।।
हम भी तो गुजरात आ गए।
क्या बतलाएं होली में।।
मस्तानी चालें चलकर हम।
किसे दिखाएं होली में।।
आओ बैठो हंसने वालों ।
हंसें हंसाएं होली में ।।
एक साथ सब मिलकर गाएं ।
जश्न मनाएं होली में ।।
झूम झूमकर नाचें गाएं।
करें ठिठोली होली में।।
भाषा प्रांत धर्म का टंटा ।
चलो जलाएं होली में ।।
जहां प्रेम है, वहीं पहुंच कर ।
हाथ मिलाएं होली में ।।
-अन्वेषी

होली अब हो ली

होली अब हो ली
अब न करो ठिठोली।
चलो फिर लड़े झगड़ें।
चले दनादन फिर बत गोली।
अमन चैन से तुम बैठो।
तो घर सूना सूना लगता है।
क्रीम पाउडर पुता चेहरा।
भी जूना जूना लगता है।
आओ फिर छेड़ें युद्ध राग।
हर चिता दुःख जाएगा भाग।
बेलन झाड़ू चले दुपहरी।
होली अब हो ली।
शाम समय में हम तुम्हारी बड़ बड़ सुन लेंगे।
और रात की लड़ाई का मुद्दा चुन लेंगे।
खाने में नमक है ज्यादा ऐसा तुम भी कह लेना।
रौद्र रस प्रिय तुम भी में थोड़ा बह लेना।
चारो पहर रहे न कोई कसर।
ऐसे लड़ते भिड़ते बीते जीवन का सफर।
सभी शादी शुदा दंपतियों को सादर सप्रेम समर्पित
बुरा न मानो होली है।
-प्रज्ञा पाण्डेय मनु
वापी, गुजरात

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