मुख्यपृष्ठस्तंभपड़ताल : १५ साल बाद जागी सरकार!

पड़ताल : १५ साल बाद जागी सरकार!

जेदवी

करीब डेढ़ दशक तक फाइलों में धूल खाती रही नई मुंबई मेट्रो लाइन-२ परियोजना को आखिरकार राज्य सरकार ने मंजूरी दे दी है। महाराष्ट्र सरकार ने १३ मार्च २०२६ को इस परियोजना को हरी झंडी देते हुए राज्य बजट में इसके लिए ५,५७५ करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। लेकिन १५ साल बाद मिली इस मंजूरी ने विकास की उम्मीदों से ज्यादा कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों और स्थानीय नागरिकों का मानना है कि इतनी लंबी देरी ने परियोजना की लागत को कई गुना बढ़ा दिया है और अब इसके समय पर पूरा होने को लेकर भी संशय बना हुआ है।

१५ साल की देरी, तीन गुना बढ़ी लागत
नई मुंबई मेट्रो लाइन-२ का प्रस्ताव सिटी एंड इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (सिडको) ने वर्ष २०११ में तैयार किया था। उस समय इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब १,६०५ करोड़ रुपए थी, लेकिन वर्षों तक चली प्रशासनिक सुस्ती, फंडिंग की अनिश्चितता और निर्णय लेने में देरी के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ पाई। अब जब इसे मंजूरी मिली है तो इसकी लागत बढ़कर ५,५७५ करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। यानी सिर्फ देरी की वजह से इस परियोजना पर लगभग चार हजार करोड़ रुपए से अधिक का अतिरिक्त बोझ पड़ चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर निर्णय लिया जाता तो यह परियोजना कहीं कम लागत में पूरी हो सकती थी।
कागजों में कैद रही योजना
करीब १५ साल तक यह मेट्रो परियोजना फाइलों में ही उलझी रही। सिडको द्वारा प्रस्ताव तैयार करने के बाद भी इसे राज्य सरकार से अंतिम मंजूरी मिलने में लंबा समय लग गया। प्रशासनिक प्रक्रियाओं की धीमी रफ्तार और विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण यह योजना बार-बार अटकती रही। नतीजा यह हुआ कि नई मुंबई जैसे तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्र को मेट्रो जैसी महत्वपूर्ण परियोजना के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ा।
ठेकेदारों की विफलता भी बनी वजह
सिडको अधिकारियों के अनुसार, इस परियोजना में शुरुआती चरण में नियुक्त किए गए ठेकेदारों द्वारा काम समय पर पूरा नहीं किया जा सका। कई मामलों में अनुबंध रद्द करने की नौबत भी आई। ठेकेदारों की इस विफलता और नई निविदा प्रक्रियाओं में लगने वाले समय ने भी परियोजना की रफ्तार को प्रभावित किया। इसका सीधा असर परियोजना की समय-सीमा और लागत दोनों पर पड़ा।
८.१५ किलोमीटर का कॉरिडोर, ८ स्टेशन
प्रस्तावित मेट्रो लाइन की कुल लंबाई ८.१५ किलोमीटर होगी, जो तलोजा एमआईडीसी से खांदेश्वर के बीच चलेगी। इस रूट पर कुल आठ स्टेशन प्रस्तावित हैं, जिनमें खांदेश्वर, सेक्टर-१० कामोठे, सेक्टर-२E कलंबोली, सेक्टर-७E कलंबोली, सेक्टर-१३ कलंबोली, कसाड़ी और एमआईडीसी के दो स्टेशन शामिल हैं।
इस परियोजना का क्रियान्वयन सिडको द्वारा किया जाएगा। हालांकि, निर्माण कार्य को पूरा करने की स्पष्ट समय-सीमा अभी घोषित नहीं की गई है, जिससे लोगों के मन में इसे लेकर संशय बना हुआ है।
कनेक्टिविटी का अधूरा गणित
इस परियोजना से जुड़ा एक और सवाल कनेक्टिविटी को लेकर उठ रहा है। नई मुंबई मेट्रो लाइन-१ (बेलापुर–पेंधर) अभी तक पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई है।
लाइन-१ और प्रस्तावित लाइन-२ के बीच लगभग २.२ किलोमीटर का गैप है, जिसे जोड़ने को लेकर लंबे समय तक निर्णय नहीं हो सका। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मेट्रो नेटवर्क की समग्र योजना पहले ही स्पष्ट कर दी जाती तो कनेक्टिविटी की यह समस्या सामने नहीं आती।
निर्माण से बढ़ सकती हैं स्थानीय परेशानियां
मेट्रो निर्माण शुरू होने के साथ ही तलोजा, कामोठे और कलंबोली जैसे इलाकों में नई समस्याएं पैदा होने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय व्यापारियों और निवासियों का कहना है कि लंबे समय तक चलनेवाले निर्माण कार्य के कारण सड़कों का संकुचन, ट्रैफिक जाम और धूल-प्रदूषण जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इससे छोटे कारोबारियों और रोजाना यात्रा करनेवाले लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
एयरपोर्ट कनेक्टिविटी की उम्मीद
इस मेट्रो लाइन को भविष्य में नई मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से जोड़ने की भी योजना बताई जा रही है। यदि यह योजना पूरी तरह लागू होती है तो तलोजा, कामोठे और कलंबोली जैसे क्षेत्रों की कनेक्टिविटी बेहतर हो सकती है।
हालांकि, फिलहाल लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि १५ साल तक लंबित रही यह परियोजना अब जमीन पर कितनी तेजी और पारदर्शिता के साथ उतर पाएगी।

नई मुंबई मेट्रो लाइन-२ को मिली मंजूरी को सरकार विकास की दिशा में अहम कदम बता रही है। लेकिन १५ साल की देरी, तीन गुना बढ़ी लागत और स्पष्ट समय-सीमा का अभाव इस परियोजना पर कई सवाल खड़े कर रहा है।
अब देखना यह होगा कि लंबे इंतजार के बाद शुरू होने जा रही यह परियोजना वास्तव में लोगों के लिए राहत साबित होती है या फिर यह भी देरी और बढ़ती लागत की एक और मिसाल बनकर रह जाती है।

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