मुख्यपृष्ठधर्म विशेषमहामृत्युंजय हैं शिवॐ

महामृत्युंजय हैं शिवॐ

शीतल अवस्थी

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।
ऋग्वेद में महामृत्युंजय मंत्र इसी प्रकार दिया गया है। यह मंत्र भगवान शिव को प्रसन्न कर उनकी असीम कृपा प्राप्त करने का माध्यम है। इसका सवा लाख बार निरंतर जप करने से आने वाली अथवा मौजूदा बीमारियां तथा अनिष्टकारी ग्रहों का दुष्प्रभाव तो समाप्त होता ही है। इस मंत्र के माध्यम से अटल मृत्यु तक को टाला जा सकता है। शिवपुराण के सतीखंड में इस मंत्र को ‘सर्वोत्तम’ महामंत्र’ की संज्ञा से विभूषित किया गया है। मृत संजीवनी मंत्रों मम सर्वोत्तम स्मृत:, इस मंत्र को शुक्राचार्य द्वारा आराधित ‘मृतसंजीवनी विद्या’ के नाम से भी जाना जाता है। नारायणणोपनिषद् एवं मंत्र सार में मृत्युर्विनिर्जितो यस्मात तस्मान्यमृत्युंजय स्मत: अर्थात मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के कारण इन मंत्र योगों को ‘मृत्युंजय’ कहा गया है।
सावन में शिवभक्तों द्वारा शिव पुराण, शिवलीलामृत, शिव कवच, शिव चालीसा, शिव पंचाक्षर मंत्र, शिव पंचाक्षर स्त्रोत, महामृत्युंजय मंत्र का पाठ एवं जाप किया जाता है। महामृत्युंजय मंत्र को संपु:युक्त बनाने के लिए इसका उच्चारण इस प्रकार किया जाता है।
ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुव: स्व:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
ॐ स्व: भुव: भू: ॐ स: जूं हौं ॐ!!
अर्थात, हम भगवान शंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण अपनी शक्ति से कर रहे हैं। उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बंधनों से सदा के लिए मुक्त हो जाएं, तथा आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में लीन हो जाएं। इसके बाद अकेले में कुश के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का जप करें। कम से कम ५ माला जाप अवश्य करें। कालसर्प दोष का प्रभाव कम करने के लिए श्रावण में इसका जप उत्तम है।
महामृत्युंजय मंत्र के बारे में धर्म शास्त्रों में एक वर्णन मिलता है। उसके अनुसार, ऋषि मृकंदु की कोई संतान नहीं थी। वे भगवान शिव के उपासक थे। सो, उन्होंने शिव की कठिन तपस्या की। तब भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। उन्होंने संतान प्राप्ति का वर मांगा। भगवान ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर बताया कि तुम्हारे भाग्य में संतान नहीं है। हालांकि तुमने मेरी कठिन साधना की है इसलिए मैं तुम्हें पुत्र प्राप्ति का वर देता हूं, लेकिन उसकी आयु केवल सोलह वर्ष की ही होगी। भगवान के कहे अनुसार, कुछ समय के बाद उनके घर में एक पुत्र ने जन्म लिया। उसका नाम मार्कंडेय रखा गया। पिता ने मार्कंडेय को शिक्षा के लिए ऋषि मुनियों के आश्रम में भेजा। धीरे-धीरे पंद्रह वर्ष व्यतीत हो गए। और सोलहवे वर्ष में मार्कंडेयजी शिक्षा प्राप्त कर घर लौटे। उन्होंने देखा कि उनके माता-पिता उनके लौटने पर खुश नजर नहीं आ रहे, वे उदास थे। जब मार्कंडेयजी ने उनसे उनकी उदासी का कारण पूछा, तो पिता ने उनको सारा हाल कह सुनाया। मार्कंडेयजी ने पिता को विश्वास दिलाया कि उन्हें कुछ नहीं होगा। माता-पिता से आज्ञा लेकर मार्कंडेयजी भगवान शिव की तपस्या को निकल पड़े। वहीं उन्होंने महामृत्युंजय मंत्र की रचना की। वे वर्ष भर तक उसका जाप करते रहे। जब सोलह वर्ष पूर्ण हो गए, तो उन्हें लेने के लिए जब यमराज आए, तब भी वे शिव भक्ति में लीन थे। जैसे ही यमराज उनके प्राण लेने आगे बढ़े, मार्कंडेयजी शिवलिंग से लिपट गए। उसी समय भगवान शिव हाथ में त्रिशूल लिए प्रकट हुए और उन्होंने आदेश सुनाया कि इस बालक को उन्होंने दीर्घायु प्रदान की है। इस पर यमराज ने भगवान शिव को नमन किया और वहां से चले गए। भगवान शिव ने मार्कंडेयजी को कहा, ‘तुम्हारे द्वारा रचित यह मंत्र मुझे अत्यंत प्रिय होगा। भविष्य में भी जो कोई इसका स्मरण करेगा, मेरा आशीर्वाद उस पर सदैव बना रहेगा। इस मंत्र का जप करने वाला मृत्यु के भय से मुक्त होगा और उस पर मेरी कृपा हमेशा बनी रहती है। यह मंत्र महामृत्युंजय कहलाएगा। यही बालक बड़ा होकर मार्कंडेय ऋषि के नाम से विख्यात हुआ।

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