मुख्यपृष्ठनए समाचारबीमारियों से कराह रहा महाराष्ट्र...एड्स से हर साल १,६८० मौतें!

बीमारियों से कराह रहा महाराष्ट्र…एड्स से हर साल १,६८० मौतें!

धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई

विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच महाराष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत चिंताजनक होती जा रही है। सरकारी रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि राज्य बीमारियों के बोझ से कराह रहा है जहां एड्स से हर साल करीब १,६८० लोगों की मौत हो रही है। वहीं कॉलरा के मामले २२ से बढ़कर १,०२८ तक पहुंच गए हैं और गैस्ट्रो के २७ हजार से अधिक मरीज हर साल सामने आ रहे हैं। दूसरी ओर स्थिति यह है कि ग्रामीण इलाकों में विशेषज्ञ डॉक्टरों का भारी टोटा है। स्वास्थ्य सेवाएं कई जगह चरमराई हुई दिखाई दे रही हैं और आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण अब भी गंभीर समस्या बना हुआ है। इन आंकड़ों ने विकास के दावों के बीच महायुति सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत उजागर कर दी है।
महाराष्ट्र की आर्थिक समीक्षा में सामने आए आंकड़ों ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की चिंताजनक तस्वीर उजागर कर दी है। विकास और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के दावों के बीच वास्तविकता यह है कि राज्य में जलजनित बीमारियों, संक्रमण और कुपोषण की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि कुष्ठ रोग के मामलों में भी वृद्धि दर्ज की गई है। २०२४-२५ में इसका प्रसार दर १.१३ थी, जो २०२५-२६ में बढ़कर १.२६ प्रति १०,००० आबादी हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियों को उजागर करती है।
बच्चों-महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण की समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है, जिससे बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। कुल मिलाकर स्वास्थ्य क्षेत्र के ये आंकड़े विकास के दावों के बीच कई बड़े सवाल खड़े करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
एलोपैथी की कमी, आयुष डॉक्टर दे रहें सेवाएं
राज्य में डॉक्टरों की उपलब्धता भी एक बड़ा मुद्दा बन गई है। सरकार भले ही डॉक्टर जनसंख्या अनुपात १:३४३ होने का दावा करती है। लेकिन इसमें बड़ी संख्या में आयुष डॉक्टर भी शामिल हैं। वास्तविकता यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ एलोपैथिक डॉक्टरों की भारी कमी है, जिससे मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता।
प्रदूषण ने भी बजाई खतरे की घंटी
इसके साथ ही पानी के प्रदूषण ने भी खतरे की घंटी बजा दी है। राज्य के १७७ निगरानी केंद्रों में कई जगह पानी के नमूनों में अनुज्ञेय सीमा से अधिक बीओडी प्रदूषण पाया गया है, जो जलजनित बीमारियों के पैâलाव का बड़ा कारण माना जा रहा है। मातृ और शिशु स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। राज्य में शिशु मृत्यु दर १४ और मातृ मृत्यु दर ३६ दर्ज की गई है। वहीं एड्स से हर साल लगभग १,६८० लोगों की मौत होना भी गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है।

अन्य समाचार