डॉ. ममता शशि झा
मुंबई
होली के दिन छल मोहन बाबू अपन पत्नी संगीता सँ कहलखिन, ‘उठु ने किछु बना लिय, लोक सब घर पर एता ते किछु खुएबनि-पिएबनि नहीं।’ ई कहिक हॉलमे आबिक बैसि गेला।
हुनकर बाकी घरक सब सदस्य सब काल्हिए रिसोर्ट चलि गेल छथि। बेटा-पूतहु, पोता-पोती आ हुनकर दोस्त सबहक ‘प्रâेंड्स टर्न्ड पैâमिली’ बला ग्रुप छनि जाहिमे मोहन बाबू के बेटा-पूतहु के सब दोस्त अपन धिया-पूता के संगे घूम लेल जाय छथि आ पाबनि-तिहार संगे मनबई छथि एक-दोसर संगे बॉन्डिंग (अपनत्व) बनाब लेल, अपन माता-पिता के अपनत्व के अनदेखा करईत। मोहन बाबू सोचइ छला जे इ कोन नबका संस्कृति बनि रहल अछि जाहिमे अपन घरक लोकक संगक अपनत्व के कोनो ने मोल आ महत्व रहि गेल छइ? अपना सबमे मित्र आ मित्रता के महत्व सबदिन सँ छइ, मुदा अपन परिवार के अनदेखा आ महत्वहीन बुझि क नहि, सब बच्चा आ घरक पैघक दोस्त-महिम सब सँ सबके अपनत्वक भाव रहइ छल। आब तो अजीबे गप्प देखि रहल छलखिन। घरमे ककरो नहिं देखिक आब कोनो दुख नहिं होइ छलनि, कतेको बरख सँ इ सब देखइत-देखइत। शुरू-शुरूमे धिया-पूता नहिं जाय चाहइ छलइ, बेटाके ई बात कहला पर जे रह दियउ ने नहिं जेबाक छइ ओकरा सबके त, जाहि लेल दुनु बेगतीमे कनमन-झनमन होअ लागइ छलनि, आ पूतहु के अनुसार हमसब बच्चा सबहक ग्रोथ रोकि रहल छियइ, ई बात सुनि क हुनकर पत्नी संगीता बच्चा सबके बहला-फुसलाकर के पठा दई छलखिन। दुनु दंपति बुझइ छलखिन जे इ प्रक्रिया धिया-पूता के बाहर सँ जोड़ लेल नहि, बल्कि हिनका सब सँ अपनत्व के भाव तोड़ लेल भे रहल अछि। मुदा बुझितो अनजान बनि जाए छलथि।
ई सब सोचिते छलथि की देखलखिन जे संगीता चाय बनाक लेने आबि रहल छलखिन। काल्हि साँझेमे ओ छोटका रंग आ अबिर के डिब्बा खरीद लेने छलखिन, संगीता हुनका जेबीमे रखईत देखि लेने छलखिन। मोहन बाबू के रंग खेलके सिनेह बुझल छलनि, बुझई छलखिन जे लगमे जायते हुनका रंग आ अबिर लगा देथिन, हुनको बड़ नीक लगई छलनि, मुदा दूरे स कहलखिन, हे रंग आ अबिर नहिं लगायब, पछिला बेरक गप्प मोन अछि की नहिं, जे घरमे रंग आ अबिर लागल देखिक पूतहु कतेक खौजायल छलि। आ अहि बेर ते कहि क गेलि जे ‘मम्मीजी पापा के दोस्त सब संगे होली खेलेबाक हेतनि ते कंपाउंडमे जा क खेल लेल कहियथिन, घर घिनेबाक काज नहि छनि।
मोहन जी के रंग बला डिब्बा हाथेमे रहि गेलनि।
बाहर सँ गीत सुनाई पडलनि- ‘रंग बरसे…!!!’
