मुख्यपृष्ठअपराधइगतपुरी के छात्रावास में नाबालिगों से दुष्कर्म!

इगतपुरी के छात्रावास में नाबालिगों से दुष्कर्म!

– कुकर्म से पहले दी जाती थी नशीली गोलियां

– पांचवीं से सातवीं कक्षा तक के छात्रों का यौन शोषण

– लगभग पांच महीनों से चल रहा था यह सिलसिला

सुनील ओसवाल / मुंबई

इगतपुरी शहर में समाज कल्याण विभाग के एक छात्रावास से सामने आई घटना ने राज्य की बाल सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पांचवीं से सातवीं कक्षा तक के ८ नाबालिग छात्रों को कथित तौर पर नशीली गोलियां देकर उनके साथ अनैसर्गिक कृत्य किए जाने का मामला उजागर हुआ है। इस प्रकरण में छात्रावास के ही दसवीं कक्षा के सात विधि-संघर्षित किशोरों की संलिप्तता सामने आई है। घटना की जानकारी होने के बावजूद समय पर पुलिस को सूचना न देने के आरोप में छात्रावास अधीक्षक सुशांत दूधसागरे पर भी मामला दर्ज किया गया है।
प्राथमिक जानकारी के अनुसार, आरोपी छात्र छोटे बच्चों को छात्रावास परिसर से सुनसान स्थानों पर ले जाते थे। वहां उन्हें नशीली व भांग मिश्रित गोलियां दी जाती थीं और फिर उनके साथ अत्याचार किया जाता था। पीड़ित छात्रों का कहना है कि विरोध करने या किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी जाती थी। छात्रावास परिसर के घने पेड़-पौधों और एकांत हिस्सों का कथित रूप से दुरुपयोग कर यह सिलसिला लगभग पांच महीनों से चल रहा था। भय और दबाव के कारण बच्चे चुप रहे, लेकिन कुछ छात्रों ने अंततः अपने अभिभावकों को पूरी बात बताई, जिसके बाद मामला सार्वजनिक हुआ।
पीड़ित छात्रों ने पेट दर्द और शारीरिक पीड़ा की शिकायत की है। चिकित्सकीय परीक्षण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इस बीच अभिभावकों में तीव्र आक्रोश है। उनका कहना है कि यदि बच्चों की बात पहले गंभीरता से सुनी जाती, तो यह घटना इतने लंबे समय तक जारी नहीं रहती। परिजनों ने दोषियों के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग की है। पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि कथित रूप से इस्तेमाल की गई नशीली गोलियां कहां से लाई गर्इं। प्रारंभिक आशंका है कि घोटी और इगतपुरी क्षेत्र की कुछ टपरियों से ये पदार्थ खरीदे गए हो सकते हैं। पुराने मुंबई-आगरा राजमार्ग के पास स्थित एक दुकान संचालक से पूछताछ की गई है। इगतपुरी पुलिस थाने में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है और संबंधित धाराओं के तहत आगे की कार्रवाई की जा रही है। यह घटना केवल एक आपराधिक कृत्य भर नहीं है, बल्कि संस्थागत निगरानी और जवाबदेही की गंभीर विफलता का संकेत भी है। जिस छात्रावास को वंचित और जरूरतमंद बच्चों के सुरक्षित आश्रय के रूप में देखा जाता है, वहीं इस तरह की घटनाओं का सामने आना प्रशासनिक सतर्कता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। बाल संरक्षण से जुड़े कानूनों की मौजूदगी के बावजूद यदि ऐसे कृत्य महीनों तक अनदेखे रह जाते हैं, तो यह व्यवस्था के आत्ममंथन का समय है।

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