मेरी नसीहत

जिंदगी के सफर में धूप तो होगी
तुम चल सको तो निकलो
भीड़ में धक्के मिलेंगे, ठोकरें भी नसीब होंगी
सहन कर सको तो निकलो।
रास्ते कब मुड़ते हैं किसी के वास्ते
तुम अपनी ‘दिशा’ तय कर सको तो निकलो
कदम कदम पर चुनौती खड़ी है
जोखिम और जख्मभरी राहें मिलेंगी बहुतेरी
सहर्ष, निर्विवाद, स्वीकार सको तो निकलो।
दावे झूठे हैं, दावों को छोड़ दो… तोड़ दो,
अपने निर्धारित लक्ष्य को अंजाम दे सको तो निकलो
किनारा, तुमसे मिलने से रहा,
तुम किनारे को छू लेने के उद्देश्य से निकलो।
शिकायतें कितनी और किस किस से करोगे?
कोई सब्र से सुनने वाला तो हो
बेहतर है, सामना शिकवों का कर सको तो निकलो
तुम्हारे अपने ‘आंसू’ ही, तुम्हारी प्यास बुझाएंगे
तुम, अपनी ‘रुलाई’ पी सको तो निकलो।
ख़्वाब जो देखा करते हो अक़सर
उसे ‘हकीकी लिबास’ ओढ़ा सको तो निकलो
‘जिंदगी की कसौटी’ बड़ी कठिन है
इस पर खुद को कस सको तो निकलो।
हर मंज़िल ‘इम्तिहान’ लेती है
‘जिंदगी का पर्चा’ हल कर सको तो निकलो
तुम्हें अपना जान ‘हिदायत’ है
मेरी नसीहत मानकर चल सको तो निकलो।
त्रिलोचन सिंह ‘अरोरा’

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