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न्यूज स्कैन : …और छलक पड़े… तुषार गांधी के आंसू

एम एम एस

साबरमती आश्रम में जो मंजर दिखा, उसने इतिहास और विरासत प्रेमियों को झकझोर कर रख दिया। आमतौर पर पुस्तक विमोचन उल्लास का अवसर होता है, लेकिन तुषार गांधी के चेहरे पर मुस्कान नहीं, बल्कि एक गहरी टीस थी। वहां उत्सव की जगह उस सादगी की ‘शवयात्रा’ जैसा मौन था, जिसे महात्मा गांधी ने जिया था।
सादगी पर ‘कॉर्पोरेट’ प्रहार। तुषार गांधी के लिए साबरमती आश्रम मात्र एक स्मारक नहीं, उनका पुश्तैनी घर और वैचारिक जड़ है। लेकिन वहां हुए बदलावों ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया।
फाइव-स्टार बनाम मिट्टी की महक। जिस आश्रम की आत्मा खद्दर और मिट्टी में बसी थी, वहां अब चमकते टाइल्स और आधुनिक सुख-सुविधाओं का पहरा है। यह वैसा ही है जैसे बापू के साधारण चश्मे पर किसी ने कीमती ‘डिजाइनर प्रâेम’ चढ़ा दिया हो। चमक तो बढ़ गई, लेकिन सादगी का ‘विजन’ धुंधला गया।
अंतिम किला ‘हृदयकुंज’। तुषार गांधी के अनुसार, साबरमती में अब केवल ‘हृदयकुंज’ (बापू का निवास) ही अपनी मौलिकता बचाए हुए है। बाकी पूरा परिसर किसी जीवंत आश्रम के बजाय एक बेजान ‘कॉर्पोरेट म्यूजियम’ जैसा लगने लगा है।
यादों की ‘री-ब्रांडिंग’ का दर्द।
उनकी आंखों के आंसू केवल र्इंट-पत्थर बदलने के दुख में नहीं थे। उन्हें डर है कि दीवारों के साथ-साथ बापू के मूल विचारों को भी ‘री-एडिट’ और ‘री-ब्रांड’ किया जा रहा है। उनकी पुस्तक ‘लेट्स किल गांधी’ इसी विचारधारा पर चोट करती है कि गांधी को गोलियों से मारना तो आसान था, लेकिन उनकी विरासत को आधुनिकता के बोझ तले दबाना कहीं अधिक घातक है।
जब सादगी को विलासिता से बदल दिया जाए, तो वह विकास नहीं बल्कि विरासत की विदाई है।
तुषार गांधी का भावुक होना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या आधुनिकीकरण की दौड़ में हम गांधी के ‘विचारों’ को भी म्यूजियम की वस्तु बना रहे हैं? उनके लिए यह पर्यटन स्थल का नवीनीकरण नहीं, बल्कि उस जीवन-दर्शन का अंत है जिसने पूरी दुनिया को सादगी का पाठ पढ़ाया। एक प्रपौत्र के लिए अपनी जड़ों को ‘चकाचौंध’ की भेंट चढ़ते देखना, किसी वैचारिक त्रासदी से कम नहीं था।
शायद वह यह कहना चाह रहे थे कि गांधी आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, लेकिन क्या हम उन्हें उनकी असलियत में स्वीकार करने को तैयार हैं, या सिर्फ एक पॉलिश की हुई छवि में?

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