सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र में स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियां अब खुलकर सामने आने लगी हैं, जहां हीमोफीलिया मरीजों को जीवनरक्षक इलाज तक नसीब नहीं हो रहा है। दवाओं की भारी कमी और ठोस सरकारी नीति के अभाव में मरीजों को मजबूरन गुजरात, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों का रुख करना पड़ रहा है, जहां आधुनिक उपचार और प्रोफिलैक्सिस जैसी सुविधाएं नियमित रूप से उपलब्ध हैं। अपने ही राज्य में इलाज के लिए भटकते ये मरीज व्यवस्था की संवेदनहीनता का शिकार बन रहे हैं। इस गंभीर मुद्दे की गूंज अब सदन तक पहुंच चुकी है, जहां सरकार से जवाब और त्वरित कार्रवाई की मांग तेज हो गई है।
महाराष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए प्वाइंट ऑफ इन्फॉर्मेशन के तहत विधानपरिषद सदस्य उमा खापरे ने सदन में हीमोफीलिया मरीजों की बदहाल स्थिति को उजागर किया। उन्होंने कहा कि राज्य में इन मरीजों को जीवनरक्षक इलाज तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, जो बेहद चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है। खापरे ने स्पष्ट किया कि दवाओं की भारी कमी और ठोस सरकारी नीति के अभाव के कारण मरीजों को मजबूर होकर गुजरात, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों का रुख करना पड़ रहा है। इन राज्यों में आधुनिक इलाज और प्रोफिलैक्सिस जैसी सुविधाएं नियमित रूप से दी जा रही हैं, जबकि महाराष्ट्र इस मामले में पीछे रह गया है।
एंटी-हीमोफीलिया दवाओं की आपूर्ति बंद
खापरे ने यह भी बताया कि मुंबई के केईएम और पुणे के ससून जैसे प्रमुख सरकारी अस्पतालों में जरूरी एंटी-हीमोफीलिया दवाओं की आपूर्ति बंद हो चुकी है। इससे मरीजों की परेशानी और बढ़ गई है। ऐसे में उन्हें इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है।
