सना खान
जिंदगी का एक अजीब सच यह है कि हर सच सुकून नहीं देता। कई बार इंसान पूरी तरह सही होता है। उसकी सोच, उसका निर्णय, उसका पक्ष सब सही होता है। फिर भी उस सही होने के साथ मन हल्का नहीं होता, बल्कि भीतर कहीं एक खामोश खालीपन उतर आता है। क्योंकि सच अक्सर अकेला होता है।
उसे साबित करने में बहसें जीत ली जाती हैं, लेकिन कई बार उन्हीं बहसों के बीच रिश्ते हार जाते हैं। समय के साथ इंसान यह समझने लगता है कि हर सच को साबित करना जरूरी नहीं होता। कुछ सच्चाइयां ऐसी भी होती हैं जो शब्दों से ज्यादा खामोशियों में समझी जाती हैं।
शायद जिंदगी का फलसफा यही है। हर जीत खुशी नहीं देती और हर खामोशी हार नहीं होती। कभी-कभी इंसान सही होते हुए भी चुप रह जाता है। क्योंकि उसे यह एहसास हो जाता है कि कभी-कभी सही होने से ज्यादा जरूरी मन का सुकून बचाए रखना होता है।
