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जनमत : लोकतंत्र का सत्यानाश! …संसद में पक्षपाती कार्रवाई … मोदी-शाह की तानाशाही की पराकाष्ठा

रामदिनेश यादव
इस बार संसद का शीतकालीन सत्र देश के लोकतंत्र के लिए काला सत्र ही माना जाएगा। देश में पहली बार विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए सत्ता पक्ष की ओर से संसद में काफी संख्या में विपक्ष के सांसदों का निलंबन किया गया है।
अब तक सत्र के दौरान निलंबित सांसदों की संख्या कुल मिलाकर १४१ पर पहुंच गई है। इनमें ९५ लोकसभा और ४६ राज्यसभा के सांसद हैं। विपक्ष का दावा है कि यह नियमों के विरुद्ध है। यह मोदी सरकार की तानाशाही है, जिसने संसद में सांसदों के निलंबन का इतिहास रच दिया है। इस सरकार ने अपने ९ साल के कार्यकाल में २५० से अधिक सांसदों को निलंबित किया है जबकि वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार में २७ सांसदों को ही निलंबित किया गया था। देश में कानून व्यवस्था चरमरा गई है और संसद में असुरक्षा के मुद्दे को लेकर असफल मोदी सरकार की द्वेषपूर्ण कार्रवाई अनुचित है।
निलंबन की कार्रवाई के बाद सांसदों ने कहा कि मोदी सरकार विपक्ष को खत्म कर संसद को ‘विपक्ष मुक्त’ देखना चाहती है। इसीलिए उसने इस प्रकार की द्वेषपूर्ण कार्रवाई करने का कदम उठाया है। सरकार तानाशाही रवैया अपना रही है। विपक्षी सांसदों का कहना है कि ऐसा करके मोदी सरकार ने ‘लोकतंत्र का गला घोंटा’ है। इतनी बड़ी संख्या में सांसदों के निलंबन को अभूतपूर्व कहा जा सकता है क्योंकि इससे पहले इतनी बड़ी संख्या में सांसदों का निलंबन कभी नहीं हुआ था। मौजूदा सत्र में जिन सांसदों को निलंबित किया गया है, उनमें महुआ माजी जैसी नई सांसद से लेकर मनोज झा, जयराम रमेश, रणदीप सिंह सुरजेवाला, प्रमोद तिवारी, फारूक अब्दुल्ला, शशि थरूर, मनीष तिवारी, डिंपल यादव जैसे पुराने और दिग्गज सांसद शामिल हैं।
बता दें १३ दिसंबर को संसद में दो लोगों के घुस आने की घटना के बाद सांसद इस पर सदन की बहस की मांग कर रहे थे। संसद में ‘सुरक्षा चूक’ को लेकर वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में गृहमंत्री अमित शाह के बयान की मांग कर रहे थे। जो कोई नई बात नहीं है। घटना के संदर्भ में विपक्ष जवाब की मांग करता है। इसमें कुछ सांसदों ने अमित शाह से इस्तीफा देने की भी मांग की है।
आक्रोशित विपक्ष के गंभीर आरोप
इस कार्रवाई से नाराज विपक्ष का कहना है कि मोदी सरकार ‘मनमानी’ पर उतर आई है। वो बेहद अहम बिलों को बगैर बहस के मनमाने ढंग से पारित करना चाहती है इसीलिए वो सदन में विपक्षी सांसदों को नहीं देखना चाहती है। मोदी सरकार ‘विपक्ष मुक्त’ देश की बात इसीलिए करती है ताकि अपनी ‘मनमानी’ कर सके। कांग्रेस ने इसे संसद और लोकतंत्र पर ‘हमला’ बताया है। विपक्ष का कहना है कि सरकार ‘विपक्ष मुक्त’ संसद चाहती है ताकि अहम बिलों को मनमाने ढंग से पारित करा सके। सरकार संसद की सुरक्षा को नजरअंदाज कर लोगों का ध्यान भटकाने का काम कर रही है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि ये सरकार को अहम बिलों को पारित करने से रोकने के लिए विपक्ष की ‘सोची-समझी’ साजिश है। उसने कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों पर लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति का अपमान करने का आरोप लगाया है।
यह अभूतपूर्व घटना है
संसद के शीतकालीन सत्र के ११वें दिन १८ दिसंबर को लोकसभा और राज्यसभा से विपक्ष के ७८ सांसदों को निलंबित किया गया। इनमें ३३ सांसद लोकसभा और ४५ राज्यसभा से थे। इसके बाद अगले ही दिन ४९ और सांसदों को निलंबित कर दिया गया। इस तरह दो दिनों में संसद से १४१ सांसदों को निलंबित कर दिया गया। संसद के इतिहास में यह अभूतपूर्व घटना है। इनमें कुछ सांसदों को संसद के पूरे शीतकालीन सत्र के लिए सस्पेंड किया गया। तो कुछ को प्रिविलेज कमेटी की रिपोर्ट आने तक निलंबित किया गया। यह समिति तीन महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपेगी।
निलंबन का अधिकार
यहां निलंबित सांसदों को नियम २५६ के तहत सस्पेंड किया गया है। जिन सांसदों को निलंबित किया गया है, उसमें विपक्षी पार्टियों के सांसद हैं। संसद भवन में विधायकों के व्यवहार और उनके आचरण को लेकर आपत्ति होने पर लोकसभा में अध्यक्ष और राज्य सभा में सभापति के पास निलंबन का अधिकार है।
क्या है नियम?
सांसदों को नियम २५६ के तहत निलंबित किया गया है। यह नियम सदस्यों के आचरण और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को परिभाषित करता है। नियमानुसार सभापति यदि आवश्यक समझे तो वह उस सदस्य को निलंबित कर सकता है, जो सभापति के अधिकार की उपेक्षा करे या जो बार-बार और जानबूझकर राज्य सभा के कार्य में बाधा डालकर राज्य सभा के नियमों का दुरूपयोग करता हो, सभापति सदस्य को राज्यसभा की कार्यवाही से ऐसी अवधि तक निलंबित कर सकता है जबतक कि सत्र का अवसान नहीं होता या सत्र के कुछ दिन तक भी यह लागू रह सकता है।
सांसदों की भारी नाराजगी के कारण
राजनीतिक नेताओं और पीठासीन अधिकारियों द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार महत्त्वपूर्ण मुद्दों को उठाने के लिये सांसदों के पास पर्याप्त समय नहीं दिया जाना। सरकार की गैर-जवाबदेही तथा और सत्ता पक्ष का प्रतिशोधी रवैया, सांसद में हमले के मामले में विफल रही केंद्र सरकार के गृह मंत्री को इस्तीफा देने की मांग, चर्चा करने के लिए विपक्ष के मुद्दों को महत्व न देना। इन तमाम कारणों से विपक्ष में भारी नाराजगी व्याप्त थी और विपक्ष ने अपनी मांगों पर विचार न होते देख हंगामे शुरू कर दिए थे।

आजादी के बाद से लेकर आज तक इस तरह से लोकतंत्र का दम घुटते कभी नहीं देखा गया। एक साथ विपक्ष के १४१ सांसदों को निलंबित करके विपक्ष की आवाज को इस तरह दबाना कतई उचित नहीं हैं आखिर वो भी इसी देश की जनता का प्रतिनिधित्व कर रहें हैं। असल में सरकार सांसदों को निलंबित करके सांसदों की नहीं देश की जनता की आवाज दबाकर अघोषित इमरजेंसी जैसे हालात पैदा कर रही है, जो भविष्य के लिए कतई सही नहीं कहा जा सकता है।
– गजेंद्र भंडारी
(अध्यक्ष-राजस्थानी जन-जागरण सेवा संस्था)
लोकसभा में हुई सुरक्षा चूक मामले से ध्यान भटकाने के लिए मोदी सरकार विपक्षी नेताओं को सदन से निलंबित कर रही है। देश के संसदीय इतिहास में इस तरह की करवाई कभी नहीं हुई है। यह एक लोकतांत्रिक देश है। देश हित के मुद्दो पर विपक्ष को सत्ता पक्ष से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। सत्ता पक्ष अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए विपक्ष को अगर निशाना बनाता है तो इसे तानाशाही वाला कदम ही माना जाएगा।
-सुशील पांडेय
(अध्यक्ष, महाराष्ट्र उत्तर भारतीय महासंगठन)
विरोधी दल के सांसदों को निलंबित कर मोदी सरकार तानाशाही भरा रवैया अपना रही है। अपने सवालों का जवाब जानने के लिए विपक्ष के सौ से ज्यादा सांसद अगर एक साथ अपनी आवाज उठातें है तो सदन में हंगामा और शोर गुल होना स्वाभाविक है। शोर गुल कर रहे सांसदों के निलंबन की करवाई करने के बजाय मोदी सरकार को संसद में सुरक्षा चूक मामले पर सवालों का जवाब देना चाहिए। जिसके लिए वे अड़े हुए हैं। मोदी सरकार इस मामले में एक तानाशाह के रूप में काम रही है। देश की जनता तानाशाही को कभी बर्दास्त नहीं करेगी।
-सचिन पाटील, दिवा, ठाणे
 संसद में चर्चा हमारी लोकतांत्रिक परंपरा का आधार है! १४१ सांसदों को निलंबित कर देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था में जनता की आवाज़ को दबाया जा रहा है। एक सांसद १५ लाख लोगो का प्रतिनिधित्व करते है। गैर कानूनी ढंग से निलंबित करके मतदार का अपमान किया है। सभी सांसद लोकतंत्र के जरिए चुने गए हैं। संविधान खतरे मे है। देश के गृह मंत्री अमित शाह को संसद में आकर हमले पर बयान देना चाहिए और इस पर चर्चा होनी चाहिए।
संतोष गुप्ता, जिला सचिव
दक्षिण मुंबई जिल्हा कांग्रेस कमिटी

जनता का गला घोंट रही है सरकार – ममता बनर्जी
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सांसदों के निलंबन पर कहा कि मोदी सरकार बेहद तानाशाही रवैया दिखा रही है। उसे सदन चलाने का कोई नैतिक अधिकार अब नहीं रह गया है। सरकार डरी हुई है और इसी लिए विपक्ष मुक्त संसद करने में जुटी है। उन्होंने कहा कि अगर उनके पास बहुमत है तो वो विपक्ष से क्यों डर रहे हैं। सांसदों के न रहने पर लोगों की आवाज कौन उठाएगा? सरकार इस तरह के कदम उठा कर लोकतंत्र का गला घोंट रही है।
लोकतंत्र का अपमान
कर रहे हैं मोदी और
शाह – मल्लिकार्जुन
सांसदों के निलंबन के फैसले के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि मोदी और गृहमंत्री अमित शाह देश भर में दौरे कर रहे हैं लेकिन सदन में नहीं आ रहे। ये सदन का अपमान है। मोदी और शाह लोगों को डराकर लोकतंत्र खत्म करना चाहते हैं। इस सरकार के कार्यकाल में देश का लोकतंत्र हासिये पर आ गया है।
गृहमंत्री को गलती
स्वीकारने में क्या समस्या है? – फारूक अब्दुल्ला
नेशनल कांप्रâेंस पार्टी के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि मुझे भी निलंबित कर दिया गया। उन्होंने कहा कि बताइए कि पुलिस किसके पास है, गृह मंत्रालय के ही अंतर्गत आती है। क्या हो जाता अगर गृह मंत्री पांच मिनट के लिए सदन में आ कर बोल देते कि जनाब चूक हुई है और मामले की जांच हो रही है। उन्होंने कहा कि जब तक सदन में विपक्ष का एक भी आदमी रहेगा, तब तक ये मांग जारी रहेगी।

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