हिमांशु राज
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में १५ मार्च को आजाद समाज पार्टी (भीम आर्मी) की कांशीराम जयंती पर प्रस्तावित रैली से ठीक पहले करणी सेना के प्रदेश महामंत्री अभिनव सिंह ने चंद्रशेखर आजाद (रावण) के खिलाफ खुला विरोध जताया। उनका विरोध स्पष्ट रूप से केवल चंद्रशेखर रावण को लेकर है। अभिनव ने कहा, `अगर बाराबंकी आए तो अपने पैरों पर आएंगे, लेकिन अपने पैरों से जा नहीं पाएंगे।’ उन्होंने चंद्रशेखर पर हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने, दलितों को भड़काने और मुसलमानों की सरपरस्ती करने का भी आरोप लगाया। जवाब में भीम आर्मी कार्यकर्ताओं ने रामकृष्ण के नाम से वीडियो जारी कर कहा कि रैली में किसी गड़बड़ी पर `उसी की भाषा में जवाब दिया जाएगा।’ समर्थकों के बीच सड़क पर हिंसक टकराव भड़क उठा, जो राजनीतिक पटल पर जातीय जंग बन चुका है। भीम आर्मी डॉ. आंबेडकर के आदर्शों पर दलित जागरण का दावा करती है, वहीं करणी सेना राजपूत गौरव की रक्षा में आक्रामक है। अभिनव सिंह का चंद्रशेखर-विशेष विरोध बाराबंकी के दलित-राजपूत समीकरण को भुनाने की रणनीति है, जहां भाजपा राजपूत वोट साधने को उतावली दिख रही है। विपक्ष इसे सत्ताधारी दल की `नरम हिंदुत्व’ चाल बता रहा है, जबकि सपा-बसपा दलित एकजुटता मजबूत करने में जुटे हैं। आगामी विधानसभा चुनावों में यह ध्रुवीकरण भाजपा के लिए जोखिम और विपक्ष के लिए सुनहरा अवसर साबित हो सकता है। अभिनव के व्यक्तिगत बयान सोशल मीडिया पर वायरल होकर राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज कर रहे हैं। भीम आर्मी का वीडियो खुली चुनौती है, जो तनाव को और भड़का रहा है। धारा १४४ लागू कर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं, लेकिन तनाव के बादल गहरा रहे हैं। यह वोट बैंक की कुरूप राजनीति का रूप है, जहां व्यक्तिगत आक्षेप और जातिगत आह्वान चुनावी हथियार बन रहे हैं। भाजपा की चुप्पी इसे और संदिग्ध बना रही है। राजनीतिक दलों को वोट की भूख से ऊपर उठकर सद्भाव का संदेश देना चाहिए। १५ मार्च को चिंगारी बड़े दंगे का रूप ले सकती है। यह घटना भारतीय राजनीति की कड़वी हकीकत उजागर करती है जाति, धर्म और व्यक्तिगत विरोध वोट के हथियार बने हैं। बाराबंकी रैली सामाजिक संरेखण की कसौटी बनेगी। क्या दल एकता चुनेंगे या विभाजन गहराएंगे? समय ही जवाब देगा।
