६७.३ प्रतिशत है १५-५९ आयु वर्ग की आबादी, फिर भी अवसरों की कमी
धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई
महाराष्ट्र की आर्थिक समीक्षा २०२५-२६ ने महायुति सरकार के विकास के दावों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य में १५ से ५९ वर्ष आयु वर्ग की आबादी ६७.३ प्रतिशत होने के बावजूद रोजगार के पर्याप्त अवसर दिखाई नहीं दे रहे हैं। कामकाजी उम्र की इतनी बड़ी युवा आबादी को आर्थिक ताकत माना जाता है, लेकिन रोजगार सृजन की धीमी रफ्तार के कारण यह संभावित ताकत चुनौती में बदलती नजर आ रही है। सरकार बेरोजगारी दर कम होने का दावा कर रही है। लेकिन जमीनी स्तर पर युवाओं के सामने नौकरी और स्थाई रोजगार का संकट बरकरार है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर नहीं बनाए गए, तो यही युवा आबादी आने वाले समय में आर्थिक और सामाजिक दबाव का कारण बन सकती है।
महायुति सरकार के बजट पर गंभीरता से गहन करने वाली ‘समर्थन’ संस्था की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार बेरोजगारी दर घटकर ३.३ प्रतिशत होने का दावा कर रही है, लेकिन यह आंकड़ा पूरी तस्वीर नहीं बताता। बड़ी संख्या में युवा अस्थाई, कम वेतन वाले या कौशल से मेल न खाने वाले काम करने को मजबूर हैं। स्थाई और गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी आज भी बड़ी समस्या बनी हुई है। राज्य की अर्थव्यवस्था देश में सबसे बड़ी मानी जाती है और उद्योग, सेवा क्षेत्र व निवेश के मामले में महाराष्ट्र लंबे समय से अग्रणी रहा है। इसके बावजूद रोजगार सृजन की रफ्तार उतनी तेज नहीं है जितनी अपेक्षित थी। इसमें कहा गया है कि विकास का लाभ अब भी कुछ बड़े शहरों तक सीमित है, जबकि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बहुत सीमित हैं।
नाकाम रही महायुति सरकार
विपक्ष का आरोप है कि महायुति सरकार इस अवसर को सही दिशा देने में नाकाम रही है। उनका कहना है कि उद्योग और निवेश के बावजूद बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा नहीं हो पाए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य को अपनी युवा आबादी को आर्थिक ताकत में बदलना है, तो रोजगार सृजन, कौशल विकास और संतुलित औद्योगिक नीति पर गंभीरता से काम करना होगा। वरना यही युवा आबादी आने वाले समय में राज्य के सामने सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन सकती है।
