धनुर्धर
पूरी दुनिया ध्यान भटकाने में लगी हुई है, लेकिन अपने मोदी जी एकाग्र चित्त से लक्ष्य बेधने की अपनी कोशिशों में जुटे हैं। आस-पास घट रही बड़ी-बड़ी घटनाओं से एकदम निरपेक्ष। यहां तक कि जिन घटनाओं का सीधा संबंध उनसे बनता है, उनका भी अपने ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ने दे रहे। उदाहरण चाहिए? एक ढूंढो, हजार मिलेंगे।
सूची से नाम गायब
एकदम ताजा मामला लीजिए। दुनिया की जानी-मानी ‘टाइम’ मैगजिन ने इस साल की १०० सबसे प्रभावशाली लोगों की जो सूची प्रकाशित की है, उसमें से अपने मोदी साहब का ही नाम गायब कर दिया है। डियर प्रâेंड ट्रंप का नाम ज्यों का त्यों है। उसे छूने की हिम्मत नहीं की है। पड़ोसी देश नेपाल के पीएम पद पर बैठे जुम्मा-जुम्मा आठ दिन नहीं हुए हैं बालेन शाह को, पर उनका भी नाम शामिल कर लिया है लिस्ट में। बस मोदी जी को इस लायक नहीं माना। सोचिए। यही नहीं, आईएमएफ ने जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की सूची निकाली है अभी-अभी, उसमें भारत का स्थान पांचवें से छठे नंबर पर पहुंचा दिखा दिया है।
दूसरे राउंड की बात
ईरान और अमेरिका के बीच मेल कराने के लिए इस्लामाबाद में जो दूसरे राउंड की बातचीत शुरू कराने की बात है, उसे लेकर पाकिस्तान के आर्मी चीफ और प्रधानमंत्री लगातार भागदौड़ कर रहे हैं। कभी सऊदी अरब से बातचीत कर रहे हैं तो कभी ईरान के नेताओं से मिल रहे हैं और फिर अगले ही पल वॉशिंगटन की दौड़ लगा रहे हैं, ताकि वाइट हाउस को बातचीत में हुई प्रगति का ब्योरा दे सकें। जाहिर है, सबकी नजरें तेजी से चल रही इन गतिविधियों पर टिकी हैं।
विश्वगुरु उदासीन हैं
अपने विश्वगुरु इन सबसे पूरी तरह उदासीन अपने अभियान में लगे हैं। उनका अभियान है- पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करना। दीदी बार-बार गच्चा दे जाती हैं। बंगाल फतह करने की पार्टी की इच्छा हर बार अधूरी रह जाती है। इस बार कोई कसर बाकी नहीं रहने देना है।
कोई और समय होता तो एक साथ सभी मोर्चों को साधने की कोशिश करते। दुनिया में अपना डंका तो वे सदा से बजवाते रहे हैं। आईटी सेल आज भी सक्रिय है। मीडिया का भी बड़ा हिस्सा साथ है ही। तो चाहते तो देसी माहौल में समां तो बांध ही देते। कह सकते थे कि ट्रंप अंदर ही अंदर एक-एक बात का ब्यौरा मोदी जी को दे रहे हैं। यह भी कि मोदी जी ने ही ट्रंप से कह दिया कि इस बार तुम लोग खुद संभाल लो, अभी मैं चुनाव में बिजी हूं।
रिस्क नहीं लेना
आईटी सेल और अपना वाला मीडिया दोनों अपनी तरफ से कमर कसे तैयार बैठे मोदी जी का एक इशारा पाने का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन मोदी जी ने उन्हें रोक रखा है। वे फिलहाल कोई रिस्क नहीं लेना चाहते। जानते हैं कि अभी वक्त खराब चल रहा है। पता नहीं डियर प्रâेंड किस बात से क्या मतलब निकाल ले। बाहर के दोस्तों-दुश्मनों पर ज्यादा वश नहीं चलता अपना। सो, उन्हें छेड़ने से बेहतर है कि घर के अंदर के दुश्मनों पर ही फोकस बनाए रखा जाए।
मोदी हैं तो मुमकिन है
चुनावी खेल के वे पुराने महारथी हैं। देखिए, ऐन चुनाव के दरम्यान संसद का विशेष सत्र बुला लिया। जो नारी शक्ति वंदन विधेयक २०२३ में ही पास हो चुका है, जिसे २०२९ से लागू करने का पैâसला सर्वसम्मति से हो चुका है, उसे २०२९ से ही लागू करने पर विचार करने के लिए यह सत्र बुलाया गया। मोदी हैं तो मुमकिन है साहब। कुछ भी हो सकता है।
गनीमत है कि घरेलू मोर्चा अभी सेफ है। यहां कोई ऐसी-वैसी फाइल भी नहीं। चुनौती तो उन लोगों की टेढ़ी नजर से बचने की है, जो एक बयान से ‘करियर’ खराब कर सकते हैं। सो, मोदी जी अभी दुनियावालों की नजरों से दूर ही भले। पाकिस्तान को जितनी वाहवाही लेनी है ले लेने दो। मोदी जी क्रेडिट के भूखे नहीं हैं।
आउटसोर्स कर दिया
रहा सवाल देश को ‘विश्वगुरु’ बनाने का तो वह प्रॉजेक्ट आउटसोर्स कर दिया है मोदी जी ने ट्रंप और नेतन्याहू जैसे दोस्तों को। वैसे तो उनके किए भी कुछ हो नहीं रहा फिलहाल, लेकिन इससे मोदी जी को क्या मतलब। उनके लेखे तो दोस्ती में किया गया इतना बड़ा त्याग आ ही चुका है। जब दिन बहुरेंगे तो इस ‘त्याग’ की कीमत वसूलने का तरीका भी ढूंढ लिया जाएगा। फिलहाल, चुनाव के बहाने शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर घुसा लिया है। तूफान गुजर जाए किसी तरह, फिर देखेंगे।
