एड. दरमियान सिंह बिष्ट
भारतीय रेलवे ने जब ‘वन नेशन, वन ऐप’ की तर्ज पर ‘रेल वन’ को लॉन्च किया तो उम्मीद थी कि अब टिकट बुकिंग और रेल सेवाओं के लिए यात्रियों को अलग-अलग ऐप्स (जैसे यूटीएस या आईआरसीटीसी) के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे, लेकिन धरातल पर हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। पिछले कुछ समय से यात्रियों की शिकायतों में आई बाढ़ ने रेलवे की डिजिटल तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मुख्य समस्याएं जो यात्रियों को चुभ रही हैं
यात्रियों की नाराजगी के पीछे कुछ ठोस और परेशान करने वाले कारण हैं:
पैसे कटे, पर टिकट गायब: सबसे बड़ी समस्या ट्रांजैक्शन फेलियर की है। मानवेंद्र राघव जैसे कई यात्रियों के बैंक खाते से राशि (जैसे रुपए ६७३.१५) कट गई, लेकिन घंटों बाद भी न तो टिकट मिला और न ही कोई कंफर्मेशन ईमेल।
पुराना डेटा गायब: आनंद जैसे यात्रियों का अनुभव बताता है कि ऐप से पुरानी बुकिंग का रिकॉर्ड भी गायब हो रहा है, जिससे आधिकारिक कार्यों के लिए टिकट कॉपी निकालना असंभव हो गया है।
यूटीएस का बंद होना: विश्वसनीय ‘यूटीएस’ ऐप को बंद कर यात्रियों को ‘रेल वन’ पर स्विच करने के लिए मजबूर किया गया, लेकिन नया प्लेटफॉर्म उस भरोसे पर खरा नहीं उतर रहा।
सोशल मीडिया पर बढ़ता आक्रोश
ट्विटर (एक्स) और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर यात्रियों का गुस्सा फूट रहा है। लोग स्क्रीनशॉट साझा कर रहे हैं कि वैâसे उनकी मेहनत की कमाई ‘तकनीकी खामी’ की भेंट चढ़ गई। यात्री संगठनों का कहना है कि रेलवे को इस ऐप के बग्स को प्राथमिकता पर ठीक करना चाहिए।
यात्रियों की मांग: ‘यदि टिकट बुक नहीं हुआ तो रिफंड तुरंत मिलना चाहिए। केवल ‘शिकायत दर्ज कर ली गई है’ जैसे रोबोटिक जवाबों से काम नहीं चलेगा।’
डिजिटल इंडिया के दौर में तकनीकी खराबी होना असामान्य नहीं है, लेकिन उसका समाधान न होना चिंताजनक है। रेलवे को चाहिए कि वह ‘रेल वन’ के बैकएंड और पेमेंट गेटवे को मजबूत करे, ताकि आम आदमी का भरोसा डिजिटल सेवाओं पर बना रहे।
अध्यक्ष
रेलवे पैसेंजर वेलफेयर एसोसिएशन
