सुनील ओसवाल
महाराष्ट्र के मंत्रालय में इन दिनों एक शब्द धीरे-धीरे चर्चा का विषय बन गया है, ‘दश… मॉडल’। यह किसी विकास योजना का नाम नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक ढिलाई का प्रतीक बन गया है, जिसमें सवाल उठते हैं, आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन पैâसले सालों तक फाइलों में बंद पड़े रहते हैं।
सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के सचिव (सड़क) रहे दश… का कार्यकाल अब समाप्ति की ओर है। मगर मंत्रालय के गलियारaों में चर्चा इस बात की ज्यादा है कि उनके दौर में कितनी फाइलें आगे बढ़ीं और कितनी धूल खाती रहीं। कई संसदीय प्रकरण ऐसे हैं, जो वर्षों से लंबित पड़े हैं। यह स्थिति केवल एक विभाग तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सबसे हैरान करनेवाली बात यह है कि मंत्रालय में कई मामलों में मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) से भेजे गए ई-मेल तक का जवाब समय पर नहीं दिया गया। मंत्रालय में काम करनेवाले अधिकारियों के बीच यह बात अक्सर सुनने को मिलती है कि यदि सीएमओ के मेल को भी अनदेखा किया जा सकता है, तो फिर आम जनता की शिकायतों का हाल क्या होगा। यह समझना मुश्किल नहीं है। यही कारण है कि प्रशासन की इस शैली को कई अधिकारी व्यंग्य में ‘दश… मॉडल’ कहने लगे हैं, जहां फाइलें आगे बढ़ने के बजाय सालों तक नोटिंग और टिप्पणी के बीच फंसी रहती हैं। दरअसल, समस्या केवल एक अधिकारी की कार्यशैली तक सीमित नहीं है। मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार, पिछले करीब तीन दशकों में १५ हजार से अधिक संसदीय प्रकरण अभी भी प्रलंबित पड़े हैं। ये वे मामले हैं जो विधिमंडल में उठाए गए थे, जिन पर मंत्रियों ने जवाब दिया, अधिकारियों ने कार्रवाई का आश्वासन दर्ज किया, लेकिन उसके बाद फाइलें आगे नहीं बढ़ीं। प्रलंबित मामलों की सूची देखें तो नगर विकास विभाग सबसे आगे है, जहां करीब ३,२३९ मामले लंबित हैं। इसके बाद स्कूली शिक्षा विभाग में १,०८३, गृह विभाग में १,०३५ और अन्य महत्वपूर्ण विभागों में भी सैकड़ों फाइलें अटकी हुई हैं और यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है। इन संसदीय प्रश्नों के पीछे अक्सर किसी गांव का अधूरा रास्ता, किसी शहर की पानी की समस्या, किसी अस्पताल की बदहाल स्थिति या किसी स्कूल की कमी जैसी वास्तविक समस्याएं होती हैं यानी विधायक और सांसद अपने मतदाताओं की आवाज लेकर सदन में जाते हैं, लेकिन मंत्रालय में वही आवाज कागजों के ढेर में दब जाती है। मंत्रालय के कुछ पुराने अधिकारी एक और दिलचस्प और गंभीर पहलू की चर्चा करते हैं। बताया जाता है कि दश… जब प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना में कार्यकारी अभियंता थे, तब उन्हें रिश्वत लेते हुए भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो ने रंगेहाथ पकड़ा था। बाद में वही अधिकारी सचिव पद तक पहुंचे। अब मंत्रालय में यह चर्चा भी सुनने को मिलती है कि किस फाइल का ‘वजन’ कितना है और किस शिकायत को आगे बढ़ाना है, इसका फैसला भी अक्सर इसी तराजू पर होता है।
पीडब्ल्यूडी के गलियारों में यह भी कहा जाता है कि कभी-कभी जिन अधिकारियों या ठेकेदारों के खिलाफ शिकायत आती है, उन्हें ही बुलाकर मामला वहीं ‘रफा-दफा’ कर दिया जाता है। चाहे शिकायत सीएमओ कार्यालय से ही क्यों न आई हो। हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभाग के भीतर ये बातें लगातार सुनाई देती रहती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसदीय प्रश्न केवल औपचारिकता नहीं होते। यह वह प्रक्रिया है, जिसके जरिए जनता सीधे शासन से जवाब मांगती है। मगर जब सालों तक जवाब ही नहीं मिलता तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह प्रक्रिया किसके लिए चल रही है, जनता के लिए या केवल रिकॉर्ड के लिए?
मुख्य सचिव ने हाल ही में सभी विभागों से प्रलंबित संसदीय मामलों का ब्यौरा मांगते हुए अधिकारियों को कड़ी चेतावनी दी है। सचिव स्तर के अधिकारियों से कहा गया है कि वे लंबित मामलों की समीक्षा कर तत्काल रिपोर्ट दें। लेकिन मंत्रालय के अनुभवी अधिकारी मानते हैं कि केवल आदेश से स्थिति बदलने वाली नहीं है। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी और फाइलों की समयसीमा तय नहीं होगी, तब तक प्रशासन की यही सुस्ती बनी रहेगी।
राज्य का बजट सत्र इस समय जारी है और यह मुद्दा जल्द ही राजनीतिक रंग भी ले सकता है। विपक्ष पहले ही सरकार पर यह आरोप लगाता रहा है कि सदन में दिए गए आश्वासन जमीन पर दिखाई नहीं देते। असल सवाल वही है जो आज मंत्रालय की फाइलें पूछ रही हैं, क्या जनता के सवाल पैâसलों में बदलेंगे या फिर वे दशकों तक फाइलों की धूल में ही दबे रहेंगे?
