मुख्यपृष्ठस्तंभरिपोर्टर डायरी : कागजी योजनाएं उलझी जमीन और भटकता मजदूर

रिपोर्टर डायरी : कागजी योजनाएं उलझी जमीन और भटकता मजदूर

सुनील ओसवाल
दोपहर की तेज धूप में निर्माणाधीन इमारत के नीचे बैठा एक मजदूर अपनी हथेली से पसीना पोंछते हुए पूछता है- ‘सर, योजना का पैसा किसे मिलता है? हमें तो बस चक्कर ही मिलते हैं।’ यही सवाल इस पूरी डायरी की बुनियाद है।
जिला कामगार कार्यालय के जरिए चलाई जा रही निर्माण श्रमिक कल्याण योजनाओं का उद्देश्य निस्संदेह श्रमिकों का जीवनस्तर सुधारना है। बजट भी कम नहीं। लेकिन जमीन पर तस्वीर सुस्पष्ट नहीं, उलझी हुई है। मुंबई, ठाणे, कल्याण, उल्हासनगर, अंबरनाथ, पालघर और बोईसर के निर्माण स्थलों और औद्योगिक क्षेत्रों में एक जैसी शिकायतें सुनाई देती हैं-प्रक्रिया जटिल है, पारदर्शिता सीमित है, और बीच की कड़ी कमजोर।
मजदूरों का कहना है कि आवेदन की प्रक्रिया तकनीकी शब्दों और कागजी औपचारिकताओं में उलझी है। एक दस्तावेज कम हो जाए तो फाइल लौटा दी जाती है। सत्यापन में हफ्तों की देरी। दिनभर की दिहाड़ी छोड़कर दफ्तर पहुंचने वाले श्रमिक के लिए यह दोहरी मार है। और इसी बीच चर्चा यह भी है कि कुछ ‘सुविधाजनक’ रास्तों से आए आवेदन तेजी से मंजूर हो जाते हैं। जिनके पास संसाधन हैं, वे सूची में शामिल हो जाते हैं। जिनके पास सिर्फ श्रम है, वे प्रतीक्षा में। यदि पात्रता की जांच समान रूप से लागू नहीं होती, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। कार्यालयों के बाहर सक्रिय मध्यस्थों की भूमिका को लेकर भी फुसफुसाहट है। कई कामगारों ने बताया कि बिना किसी ‘सहायता’ के प्रक्रिया समझना कठिन है। यदि सरकारी लाभ पाने के लिए एजेंट की जरूरत पड़े, तो यह व्यवस्था की पारदर्शिता पर सीधा प्रश्न है।
पालघर और बोईसर के औद्योगिक क्षेत्रों में प्रवासी मजदूरों की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। जानकारी का अभाव, डिजिटल आवेदन की दिक्कतें और अस्थायी निवास-इन सबके कारण वे योजनाओं से दूर रह जाते हैं। ठाणे और कल्याण में भी कई श्रमिकों ने कहा कि आवेदन की स्थिति सार्वजनिक नहीं होती, जिससे संदेह और बढ़ता है। सरकार की नीयत पर अधिकांश मजदूर सवाल नहीं उठाते। वे मानते हैं कि योजनाएं उनके हित में बनी हैं। पर नीयत और नतीजे के बीच जो प्रशासनिक श्रृंखला है, वही ढीली दिखाई देती है। कामगारों की अपेक्षा बड़ी नहीं-प्रक्रिया सरल हो, सभी को समान न्याय मिले, और लाभार्थियों की सूची पारदर्शी हो। विकास की ऊंची इमारतें तभी सार्थक हैं, जब उन्हें खड़ा करने वाले हाथों तक उनका हक बिना भटकाव पहुंचे। वरना योजनाओं की गूंज सुनाई देगी, पर मजदूर का विश्वास धीरे-धीरे खामोश होता जाएगा।

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