सुनील ओसवाल
सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में अप्रैल का महीना आते ही ‘ट्रांसफर सीजन’ अपने चरम पर पहुंच जाता है, लेकिन इस बार जो तस्वीर उभर रही है वह सिर्फ तबादलों की सामान्य प्रक्रिया नहीं बल्कि कथित तौर पर ‘पोस्टिंग बाजार’ की है, जहां पदों की कीमत तय हो रही है और बोली लगानेवालों की कतारें लगी हैं।
मार्च में सचिव (रोड) पद से दशपुते के सेवानिवृत्त होने के बाद विभाग में सत्ता संतुलन बदल गया। कोकण क्षेत्र के मुख्य अभियंता शरद राजभोज को पहले अस्थायी और फिर स्थायी रूप से इस पद पर बैठाया गया। इस नियुक्ति के साथ ही विभाग के भीतर ट्रांसफर का ‘श्रीगणेश’ हो गया और इसके बाद से गतिविधियां तेजी से बढ़ने लगीं। अब नासिक और कोकण विभाग में मुख्य अभियंता पद के लिए भी कई दावेदार के नाम का बाजार गरम है।
सूत्रों के अनुसार, मुंबई शहर इलाका और ठाणे पीडब्ल्यूडी सर्कल-२ जैसे अहम पदों के लिए करोड़ों रुपए तक की कथित बोलियां लगने की चर्चाएं जोरों पर हैं। इन पदों को ‘क्रीम पोस्टिंग’ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यहां बड़े प्रोजेक्ट, भारी फंड और ठेकेदारों का सीधा संपर्क रहता है। ऐसे में इन पदों पर नियुक्ति पाने की होड़ स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।
मंत्रालय के गलियारों में इन दिनों एक अलग ही हलचल है। जनप्रतिनिधियों के दफ्तरों में अधिकारियों की आवाजाही बढ़ गई है। ‘सिफारिश’ और ‘सेटिंग’ के बिना मनचाही पोस्टिंग मिलना मुश्किल माना जा रहा है। वहीं कुछ ‘मध्यस्थ’ भी सक्रिय बताए जा रहे हैं, जो कथित तौर पर इस पूरी प्रक्रिया को ‘मैनेज’ करने में जुटे हैं।
धुलिया (उत्तर), अंधेरी (उत्तर मुंबई) और पालघर, तलासरी, शहापुर जैसे क्षेत्रों में कार्यकारी अभियंता पदों के लिए भी जोरदार लॉबिंग जारी है। कई अधिकारी अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर रहे हैं तो कुछ कथित आर्थिक ‘पैकेज’ के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश में हैं। विभाग के एक जानकार ने बताया, ‘अब ट्रांसफर मेरिट से कम और ‘मैनेजमेंट’ से ज्यादा तय हो रहे हैं।’
इस पूरे खेल का सबसे गंभीर पहलू यह है कि इससे विभाग की कार्यप्रणाली पर सीधा असर पड़ता है। जिन पदों के लिए भारी ‘निवेश’ किया जाता है, वहां नियुक्त अधिकारी पर ‘रिकवरी’ का दबाव भी बनता है। इसका असर प्रोजेक्ट की गुणवत्ता, लागत और समयसीमा पर साफ नजर आ सकता है।
यही वजह है कि विभाग के भीतर ईमानदार अधिकारियों में भी असंतोष बढ़ रहा है। उनका कहना है कि अगर पोस्टिंग का आधार योग्यता और अनुभव की बजाय ‘बोली’ बन जाए तो सिस्टम में काम करने का उत्साह खत्म हो जाता है। इससे पूरी प्रशासनिक व्यवस्था कमजोर होती है।
सरकार लगातार पारदर्शी और भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन का दावा करती है, लेकिन अगर पीडब्ल्यूडी जैसे अहम विभाग में इस तरह की चर्चाएं हकीकत का रूप लेती हैं तो यह गंभीर चिंता का विषय है। खासकर तब, जब यह विभाग राज्य के बुनियादी ढांचे से सीधे जुड़ा हुआ है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रांसफर प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन, मेरिट-आधारित और निगरानी तंत्र के तहत लाना बेहद जरूरी है। साथ ही, किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविधि की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, ताकि सिस्टम में विश्वास कायम रह सके।
फिलहाल, अप्रैल का यह ‘ट्रांसफर सीजन’ अपने साथ कई सवाल लेकर आया है—क्या पोस्टिंग अब खुले बाजार में तय होगी? क्या पारदर्शिता सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगी? या फिर सरकार इन संकेतों को गंभीरता से लेकर व्यवस्था को साफ करने की दिशा में ठोस कदम उठाएगी?
जवाब आनेवाले दिनों में सामने आएंगे, लेकिन फिलहाल पीडब्ल्यूडी में ‘ट्रांसफर का खेल’ पूरी तरह गरम है।
