संजय राऊत- कार्यकारी संपादक
बिहार में भाजपा वगैरह की जीत के बाद भी जीत का जश्न दिखाई नहीं दिया। महाराष्ट्र में भी भाजपा की जीत के बावजूद कहीं खुशी का जश्न नजर नहीं आया। क्योंकि इन नतीजों पर किसी को यकीन नहीं है। यह ‘जनादेश’ नहीं बल्कि चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का जनादेश है, ऐसा खुलेआम कहा जा रहा है। चुनाव आयोग की बेईमानी लोकतंत्र की कब्र खोद रही है।
बिहार विधानसभा के चुनाव खत्म हो गए। नतीजे आ गए। भाजपा और नीतीश कुमार की पार्टी को प्रचंड जीत मिली, लेकिन पूरे बिहार में इस जीत की खुशी कहीं दिख नहीं रही है। महाराष्ट्र में भी यही हुआ। जो लोग इतनी बड़ी जीत के साथ सत्ता में आए, वे खुद जीत के सदमे से उबर नहीं पाए हैं। महाराष्ट्र में भी कहीं विजयी जुलूस और जश्न होते हुए दिखाई नहीं दिए। फिर इसे जनमत का पैâसला वैâसे माना जाए? यह सवाल कई लोगों के मन में उठ रहा है। बिहार में जीत के बाद भी सन्नाटा है। नीतीश कुमार नामक पलटूराम दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे हैं। राम मनोहर लोहिया और जॉर्ज फर्नांडिस से शुरू हुए सफर को उन्होंने मोदी के चरणों में आकर रोक दिया। कन्हैया कुमार ने एक वाक्य में बिहार के नतीजों का विश्लेषण किया है। वे कहते हैं, ‘‘यह बिहार का जनादेश नहीं है। ज्ञानेश कुमार का जनादेश है।’’ बिहार में कोई खुश नहीं है। छात्र सड़क पर उतर आए हैं। शिक्षक सड़क पर उतर आए हैं। गरीबों की आवाज कोई नहीं सुन रहा है। मजदूर परेशान हैं। किसान, मेहनतकश, नौकरीपेशा वर्ग, मध्यम वर्गीय सभी बिहार की राजव्यवस्था में नाराज हैं। तो फिर इस सरकार को वोट दिया किसने? यह चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का जनादेश है, जनता का नहीं।
हाईजैक!
बिहार में चुनाव ‘हाईजैक’ किए गए थे। चुनाव निष्पक्ष नहीं होंगे, इस बात पर सभी एकमत थे। चुनाव का बहिष्कार करना और ‘भाजपा को जो करना है, करने दो’ यह एकमात्र विकल्प था और कभी न कभी, लोकतंत्र की रक्षा के लिए सभी को चुनावों का बहिष्कार कर भारत में व्याप्त तानाशाही की ओर दुनिया का ध्यान खींचना होगा। बिहार और महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों के कुछ काले धब्बे दिखाना जरूरी है।
– बिहार में तेजस्वी यादव के राष्ट्रीय जनता दल को सबसे ज्यादा २३.०७ प्रतिशत वोट मिले, लेकिन उन्हें २५ सीटें मिलीं। भाजपा ने २०.८ फीसदी वोट पाकर ८९ सीटें जीतीं और जनता दल (यू) ने १९.८५ प्रतिशत वोट हसिल कर ८५ सीटें जीतीं।
– बिहार में कुल मतदाताओं की संख्या ७.४२ करोड़ है। मतदान किया ७.४५ करोड़ लोगों ने। चुनाव आयोग कह रहा है कि यह सिर्फ ६६.६७ फीसदी वोट है। मतलब बिहार में क्या १२ करोड़ मतदाता हैं?
– चुनाव से पहले सरकारी पैसों से महिलाओं के वोट खरीदने की प्रथा सत्ताधारियों ने अपनाई। मध्य प्रदेश में ‘लाडली बहना योजना’, महाराष्ट्र में ‘लाडकी बहीण योजना’, झारखंड में ‘मैया सम्मान योजना’ और बिहार में ‘महिला रोजगार’ लाकर चुनाव में ही महिलाओं के खाते में दस हजार रुपए जमा किए गए। अमूमन दस हजार में मोदी ने १.२५ करोड़ महिलाओं के वोट खरीद लिए।
– महाराष्ट्र में भाजपा ने १४९ सीटों पर चुनाव लड़ा और १३२ सीटें जीतीं। बिहार में भाजपा ने १०१ सीटों पर चुनाव लड़ा और ८९ सीटें जीतीं।
(महाराष्ट्र में शाम ५ बजे के बाद अचानक ६५ लाख वोट बढ़ गए।)
बिहार में भी यही तस्वीर है। यह भाजपा या नीतीश कुमार की जीत नहीं है। यह तेजस्वी यादव या कांग्रेस की हार नहीं है। यह बेईमान चुनाव यंत्रणा की जीत है। बिहार में ६२ लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए और २० लाख नए मतदाता जोड़े गए। इनमें से पांच लाख मतदान बिना एसआईआर फॉर्म के बढ़ा दिए गए। दलितों, अल्पसंख्यकों और गरीबों के वोट बेरहमी से काट दिए गए। यह सब चुनाव आयोग की मदद से किया गया। हम इस चुनाव यंत्रणा पर वैâसे भरोसा कर सकते हैं?
शोकांतिका किसकी?
हमें यह बात दिमाग में बैठा लेनी चाहिए कि भारतीय चुनाव अब निष्पक्ष नहीं होंगे। ग्राम पंचायत से लेकर लोकसभा तक सभी चुनाव भाजपा इसी तरह जीतना चाहती है और देश में कोई भी विपक्षी दल नहीं बचे, यही नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नीति है। कल तक जिन्हें भ्रष्टाचारी, हत्यारा और लुटेरा कहा गया, उन सभी को भाजपा अपनी पार्टी में शामिल कर रही है। इसे भारतीय लोकतंत्र की शोकांतिका मानना चाहिए। भारत में लोकतंत्र की कब्रें बनाई जा रही हैं। बिहार के नतीजों ने उस कब्र पर पुष्पचक्र अर्पित कर लोकतंत्र को श्रद्धांजलि दे दी है। बिहार के नतीजों से भारत की भविष्य की राजनीति की तस्वीर साफ हो गई है। हम सभी को इस बारे में सोचना चाहिए।
तेजस्वी की मेहनत
बिहार के प्रमुख नेता लालू प्रसाद यादव बीमार हैं। उनके सुपुत्र तेजस्वी यादव ने प्रचार की कमान संभाली और बिहार में भाजपा के खिलाफ बिगुल बजाया। तेजस्वी यादव ने ऐसा माहौल बनाया कि बिहार में चुनाव भाजपा और नीतीश कुमार के लिए आसान नहीं रहे। यादव, दलित और मुसलमान, तेजस्वी यादव के समर्थक वर्ग हैं। तेजस्वी एक बार चुनाव हार सकते हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ २५-३० सीटें मिलेंगी, यह कोई नहीं मानेगा। बिहार में भाजपा के अश्वमेध घोड़े को रोकने के लिए तेजस्वी यादव और राहुल गांधी साथ आए, लेकिन चुनाव आयोग ने नतीजा पहले ही तय कर दिया। इससे हुआ यह कि जनता का चुनाव पर से भरोसा पूरी तरह खत्म हो गया है। ऐसे चुनावों का क्या फायदा? इस तरह तो कल विरोधी पार्टियों को उम्मीदवार मिलना मुश्किल हो जाएगा और चुनाव एकतरफा हो जाएंगे। भाजपा में जो भी चुनाव जीतने की काबिलियत रखता है, उसे प्रवेश और पद दिए जाते हैं। न हिंदुत्व की लहर है, न मोदी की हवा। फिर भी भाजपा जीत जाती है। लोगों की समस्याएं जस की तस हैं और केंद्र सरकार डींगें मार रही है। फिर भी लोग मोदी को वोट क्यों दें? यह सवाल बना हुआ है। कांग्रेस ढलान पर आ रही है और क्षेत्रीय दलों का पूरी तरह से ‘खात्मा’ जारी है। चुनाव पहले धर्म के आधार पर होते थे। अब जाति-जनजाति के आधार पर चुनाव हो रहे हैं। यह मोदी-शाह ने शुरू किया और जब तक ये दोनों हैं, यह खेल इसी तरह चलता रहेगा। मोदी-शाह के दौर में पुलवामा, पहलगाम और दिल्ली तक आतंकी हमले हुए। इसका जवाब उनसे नहीं मांगा जा रहा है। कारण महिलाओं के खाते में दस हजार उड़ाकर सत्ताधारियों ने राष्ट्रीय सवाल को ही बगल कर दिया है। बिहार के चुनावों ने भारत के लोकतंत्र के नए पहलू को उजागर कर दिया है। बिहार के नतीजों को सबने नकार दिया है। जो जीते, उन्हें भी हम जीत गए, इस पर विश्वास नहीं हो रहा है।
चुनाव होते रहेंगे। भाजपा जीतती रहेगी। अब विपक्ष को क्या करना चाहिए?
चुनावों का बहिष्कार करना ही लोकतंत्र को बचाने का एकमात्र रास्ता दिख रहा है।
