संजय राऊत
कल ६ दिसंबर बीत गया! इसी दिन, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर हमें शारीरिक रूप से छोड़कर चले गए, लेकिन उनके विचार अभी भी जिंदा हैं।
४ तारीख को, वर्ली सागरी पुल से प्रभादेवी की ओर आते समय मैंने देखा कि महाराष्ट्र के कोने-कोने से जो लाखों अनुयायी बाबासाहेब के दर्शन के लिए आएंगे, उनकी लंबी-लंबी कतारों के लिए दादर की चैत्यभूमि से लेकर वर्ली सागरी पुल तक बांस की बल्लियां लगाने का काम शुरू था। यह हर साल होता है। छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद यह सौभाग्य डॉ. आंबेडकर को मिला। डॉ. आंबेडकर ने भारत को संविधान दिया। वे भारतीय संविधान के शिल्पकार हैं। आज जब रोज संविधान पर हमले हो रहे हैं, ऐसे में डॉ. आंबेडकर को याद करना ही होगा। पूर्व चीफ जस्टिस भूषण गवई ने रिटायर होते हुए कहा, ‘डॉ. आंबेडकर का आग्रह था कि न्यायपालिका स्वतंत्र होनी चाहिए। न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बरकरार रखना चाहिए। पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल जैसे देशों में जो हुआ, वो सभी ने देखा। देश की अंदरूनी और बाहरी कई समस्याओं से ग्रसित भारत आज भी अखंड है। यह संविधान की देन है। ये डॉ. आंबेडकर के हम पर उपकार हैं।’ अब एक बार फिर मुंबई को नोचने की कोशिश दिल्ली के मौजूदा शासकों और गुजरात के अमीरों ने शुरू कर दी है। ऐसे समय में संयुक्त महाराष्ट्र की लड़ाई में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा मराठी माणुस और मुंबई के लिए की गई लड़ाई याद आती है। मुंबई गुजरात की अथवा मुंबई को केंद्रशासित करने की कवायद शुरू रहने के दौरान डॉ. आंबेडकर आगे आए और उन्होंने पक्के सबूतों के साथ साबित कर दिया कि ‘मुंबई महाराष्ट्र की ही है’। उस समय, महाराष्ट्र के विरोधियों ने जो नौ सवाल उठाए थे, उनका बाबासाहेब ने सटीक जवाब दिया। वो सवाल ये थे-
-मुंबई कभी महाराष्ट्र में नहीं थी, इसके क्या सबूत हैं?
-मुंबई मराठा राज्य का हिस्सा नहीं है, यह आप किस आधार पर कहते हैं?
-मराठी भाषियों की संख्या मुंबई में सर्वाधिक नहीं है, ऐसा वैâसे कह सकते हैं? मराठी बहुमत मुंबई में है ही।
-गुजराती मुंबई के मूल रहिवासी हैं, ऐसा किस आधार पर कहते हैं?
-मुंबई एक व्यापारिक द्वीप होने के कारण यह सिर्फ महाराष्ट्र का नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्थान का है, इस बात का तथ्य क्या है?
-मुंबई का व्यापार और उद्योग गुजरातियों ने खड़ा किया है। मराठी लोग केवल हमाल और क्लर्क हैं इसलिए मुंबई को महाराष्ट्र में शामिल न किया जाए, यह दावा कितना मजबूत है?
-मुंबई की कमाई पर, लाभ पर जी सके, दूसरे की कमाई खा सके, क्या इसीलिए महाराष्ट्र मुंबई पर दावा कर रहा है?
-बहुभाषिक राज्य अच्छे होते हैं। क्योंकि वहां अल्पसंख्यक भाषी सुरक्षित रहते हैं। क्या यह ठीक नहीं है?
-‘राज्य की पुनर्रचना रैशनल होनी चाहिए, नैशनल नहीं’, क्या यह दावा उचित है? इन सवालों का जवाब देते हुए बाबासाहेब ने इतिहास और भूगोल के दोहरे सबूत सामने रखे। बाबासाहेब अपने लेख में कहते हैं, ‘मुंबई को पानी की आपूर्ति कौन करता है? महाराष्ट्र या गुजरात? जिस बिजली पर इन गुजरातियों के व्यापार-उद्योग चलते हैं, वह बिजली कहां से आती है? महाराष्ट्र से या गुजरात से? कामगार शक्ति कहां की है?’ बिजली, पानी, श्रमशक्ति महाराष्ट्र की, तो मुंबई पर हक भी महाराष्ट्र का ही है, ऐसा डॉ. आंबेडकर ने दृढ़ता से कहा। महाराष्ट्र के खिलाफ उठाए गए नौ सवालों का डॉ. आंबेडकर का विवेचन तर्कसंगत और अध्ययनशील है।
डॉ. आंबेडकर का तर्क
डॉ. आंबेडकर ‘मुंबई महाराष्ट्र की ही है’ इस भूमिका पर अडिग रहे और इसे लेकर उन्होंने पंडित नेहरू से बहस की। डॉ. आंबेडकर संयुक्त महाराष्ट्र के, एक भाषाई महाराष्ट्र के, एक भाषाई राज्य के पक्के समर्थक थे। डॉ. आंबेडकर, मुंबई पर महाराष्ट्र के दावे को रेखांकित करते हुए कहते हैं, ‘‘महाराष्ट्रीयों ने गुजरात पर जीत हासिल कर कई साल उन पर राज किया। गुजरातियों पर इसका क्या असर हुआ? कुछ नहीं। गुजराती गुजराती ही रहे और महाराष्ट्रीय महाराष्ट्रीय ही रहे।’’ बाबासाहेब आगे कहते हैं, ‘‘दमन से कारवार तक अखंड समुद्री तट यदि महाराष्ट्र का हिस्सा है, तो मुंबई महाराष्ट्र का हिस्सा नहीं है, यह वैâसे कहा जा सकता है? मुंबई महाराष्ट्र की ही है, यह प्रकृति का एक अटल, अपरिवर्तनीय सत्य है। भौगोलिक सत्य यही है कि मुंबई महाराष्ट्र का हिस्सा है। जिन्हें प्रकृति के सत्य को चुनौती देना है, वे खुशी से दें। मराठों को मुंबई को अपने साम्राज्य में शामिल करने की जरूरत महसूस नहीं हुई। इस वजह से भौगोलिक सत्य बदल नहीं जाता। मराठों को मुंबई अपने नियंत्रण में लेने की जरूरत महसूस नहीं हुई, इसका कारण यही है कि मराठा सत्ता जमीन पर राज कर रही थी। उन्हें समुद्री बंदरगाह जीतने, विकसित करने, उस पर ऊर्जा और पैसा खर्च करने की जरूरत उस काल में महसूस नहीं हुई।’’ डॉ. आंबेडकर के मुंबई पर महाराष्ट्र के दावे के ये समर्थन हैं।
अभिवादन!
डॉ. आंबेडकर के मुंबई पर, महाराष्ट्र पर और मराठी लोगों पर उपकार हैं। प्रबोधनकार ठाकरे कहते हैं, महाराष्ट्र के दो ही देवता हैं। एक छत्रपति शिवाजी महाराज और दूसरे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर। यह सच भी है। डॉ. आंबेडकर ने मानवता का विचार दिया। उन्होंने इंसान को इंसान की तरह जीने का अधिकार दिलाया। इसके लिए उन्होंने जबरदस्त संघर्ष किया। उन्होंने इंसानी समाज और हिंदू धर्म से छुआछूत के कलंक को मिटाने के लिए जिंदगीभर लड़ाई लड़ी। आखिरकार, भारतीय संविधान के माध्यम से स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के महत्व को मानकर १९५० में छुआछूत को अपराध घोषित किया गया। फिर १९५६ में बौद्ध धम्म की दीक्षा देकर मानवता से विमुख हुए इंसान को डॉ. आंबेडकर ने अस्मिता बहाल की। उसे खुद की पहचान दिलाई। यह पूरी लड़ाई उन्होंने देश के हित को तनिक भी हानि पहुंचाए बिना लड़ी। अगर समाज का एक बड़ा हिस्सा विकलांग है, तो समाज मजबूत नहीं हो सकता, ऐसा दृढ़ता से कहनेवाले महामानव डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को विनम्र अभिवादन!
